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किसानों की शिकायत पर छापामारी, खाद का स्टॉक मिला सही

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किसान संघ की ओर से डीएपी खाद की कालाबाजारी की आशंका जताने को लेकर दी गई शिकायत पर जिला प्रशासन ने शहर में खाद विक्रेताओं के यहां छापा मारकर कार्रवाई की। इस दौरान खाद के स्टॉक की जांच की गई। प्रशासन का दावा है कि सभी खाद विक्रेताओं के पास नियमानुसार ही उत्पाद मिले हैं।
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सोमवार सुबह किसान संघ के जिला अध्यक्ष सतीश कुमार ग्योंग, रणदीप आर्य व गुलतान नैन व अन्य ने डीसी को डीएपी खाद की उपलब्धता के संबंध में ज्ञापन दिया। उन्होंने ज्ञापन में आशंका जताई कि मंडी में डीएपी खाद तो उपलब्ध है, लेकिन खाद विक्रेता किसानों को नहीं दे रहे। डीसी ने इस पर संज्ञान लेते हुए एक संयुक्त कमेटी का गठन किया। जिसमें उप निदेशक डॉ. कर्मचंद, एसडीएम संजय कुमार, गुण नियंत्रण निरीक्षक को शामिल किया गया। कमेटी ने कार्रवाई करते हुए जिला के प्रमुख खाद विक्रेताओं के गोदामों की छापामारी की। स्टॉक को उनके स्टॉक रजिस्टर व पीओएस मशीन से मिलान किया। निरीक्षण के दौरान खादों का स्टॉक सही पाया गया और कहीं पर भी कोई अनियमितता नहीं पाई गई। डीडीए डॉ. कर्मचंद ने बताया कि रबी फसलों की बिजाई के लिए जिला कैथल में लगभग चार लाख बैग डीएपी की आवश्यकता होती है, जिसमें से अभी तक 30 प्रतिशत 1 लाख 20 हजार बैग डीएपी खाद किसानों को उपलब्ध करवाया जा चुका है। बकाया खाद की सप्लाई जल्द ही जिला कैथल को प्राप्त होगी। किसानों को समय रहते डीएपी खाद उपलब्ध करवा दिया जाएगा। जिला में खाद की कोई कमी नहीं रहने देंगे।
उन्होंने किसानों से अपील करते हुए कहा कि सरसों की बिजाई के लिए तीन बैग एसएसपी व एक बैग यूरिया को प्रयोग करें जो कि डीएपी खाद की तुलना में सस्ता पड़ता है। इसमें सल्फर अतिरिक्त तौर पर प्राप्त होती है। इससे पैदावार में बढ़ोतरी एवं तेल की मात्रा में वृद्धि होती है। किसान एनपीके 12:32:16 का प्रयोग भी गेहूं बिजाई के लिए कर सकते हैं। यह खाद पौधों में रोगों से लड़ने की क्षमता बढ़ाता है और दानों में वजन व चमक बढ़ाता है।
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डीसी प्रदीप दहिया ने किसान संगठनों को विश्वास दिलाया कि किसान हित सरकार के लिए सर्वोपरि हैं। जिले में खादों की कोई कमी नहीं रहने दी जाएगी। इसके दृष्टिगत पैनी नजर रखी जा रही है। खाद संबंधी विषय को लेकर यदि कोई दिक्कत रहती है तो उनसे कार्यालय में संपर्क कर सकते हैं। जिला में एसएसपी व एनपीके खादों की भरपूर मात्रा उपलब्ध है। किसानों को सलाह दी जाती है कि वे इन्हें डीएपी के विकल्प के तौर पर इस्तेमाल करें।
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