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श्राद्ध 2023: पूंडरी के फल्गु तीर्थ में पिंडदान से पितराें को मिलती है मुक्ति, देश-विदेश से पहुंचते हैं लोग

Fri, 29 Sep 2023 10:23 AM IST
नवीन दलाल नरेंद्र राणा, पूंडरी (हरियाणा)

सार

पुराणों के अनुसार फलकी-वन फरल गांव में पितृपक्ष की सोमावती अमावस्या को स्नान, तर्पण व श्राद्ध करने से गया जी से भी अधिक फल की प्राप्ति होती है। फलकी वन के स्मरण मात्र से ही पित्तरों का कल्याण सुनिश्चित हो जाता है और यहां पिंडदान करने से पित्तर मुक्ति प्राप्त करते हैं।
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Pitru Paksha 2023 - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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29 सितंबर से श्राद्ध कर्म शुरू हो रहे हैं, जो 14 अक्तूबर तक चलेंगे। सनातन धर्म में पितरों के प्रति तर्पण अर्थात जलदान पिंडदान पिंड के रूप में पितरों को समर्पित किया गया भोजन व दान इत्यादि को श्राद्ध कहा जाता है। पूंडरी स्थित फल्गु तीर्थ में कभी फल्गु नदी बहती थी लेकिन अब पांच सरोवर पर लोग पिंडदान करते हैं। बिहार के गयाजी की तरह फल्गु तीर्थ में भी देश के कोने-कोने से लोग तर्पण करने पहुंचते हैं।

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महाभारत कालीन इस तीर्थ के बारे में भी कहा जाता है युधिष्ठिर ने यहां पर पिंडदान किया था। इसी वजह से श्राद्ध कर्म और पितरों की आत्मिक शांति व पिंडदान के लिए प्रसिद्ध गया जी की तरह फल्गु तीर्थ की भी मान्यता है। ऐसे में इन दिनों में फल्गु तीर्थ पर अपने पित्तरों की आत्मिक शांति के लिए देश विदेश से लोगों का तांता लगना शुरू हो चुका है।

मान्यता है कि पितृपक्ष में श्राद्ध या पित्रों को तर्पण विधि विधान से देने से पितृ प्रसन्न होते हैं और पितृदोष समाप्त हो जाता है। शास्त्रों के अनुसार जो परिजन अपना शरीर त्याग कर चले जाते हैं। उनकी आत्मा की शांति के लिए सच्ची श्रद्धा के साथ तर्पण किया जाता है। यही श्राद्ध कर्म हैं।
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पुराणों के अनुसार फलकी-वन फरल गांव में पितृपक्ष की सोमावती अमावस्या को स्नान, तर्पण व श्राद्ध करने से गया जी से भी अधिक फल की प्राप्ति होती है। फलकी वन के स्मरण मात्र से ही पित्तरों का कल्याण सुनिश्चित हो जाता है और यहां पिंडदान करने से पित्तर मुक्ति प्राप्त करते हैं। फल्गु तीर्थ में देवता सदा निवास करते हैं और यहां के पावन सरोवर में स्नान करने से मनुष्य को अक्षय अनन्त पुण्य की प्राप्ति होती है।

ग्रामीणों ने की थी सफाई

फल्गु तीर्थ की महत्ता ही स्नान व तर्पण की है। इस अवसर पर तीर्थ पर हजारों लोग स्नान व तर्पण के लिए दूर दराज से आते हैं। शासन व प्रशासन की उपेक्षा देखकर ग्रामीणों ने स्वयं सरोवर की साफ सफाई का बीड़ा उठाया और श्राद्धों से पूर्व तीर्थ की बहुत हद तक सफाई भी की। अब तीर्थ में श्रद्धालु आसानी से स्नान कर पाएंगे।

श्री महर्षि फल्गु तीर्थ सेवा ट्रस्ट के प्रधान भीम शर्मा, उप प्रधान अशोक चौहान व ट्रस्टी सदस्यों ने बताया कि उनकी टीम ने शासन व प्रशासन की अनदेखी के चलते लगभग 15 दिन लगाकर तीर्थ की सफाई तो कर दी। अब श्रद्धालु स्नान तो आराम से कर सकेंगे, लेकिन तीर्थ तक पहुंचने वाली सबसे मुख्य व अहम सड़क की हालत खराब है। इस पर चलना किसी खतरे से कम नहीं है। जिला प्रशासन इसकी सुध लेने में आनाकानी कर रहा है। पिछले पांच वर्षों से स्थानीय लोग परेशानी झेल रहे हैं। इसकी मरम्मत कराई जानी चाहिए ताकि श्रद्धालुओं को कोई दिक्कत न हो।

फल्गु तीर्थ सभी तीर्थों से श्रेष्ठ, यहां करें तर्पण

महर्षि फल्गु के मंदिर के पुजारी दिनेश शर्मा ने कहा कि वायु पुराण के अनुसार फल्गु तीर्थ पर जाकर तर्पण व श्राद्ध करना चाहिए। वहां श्राद्ध करने से पित्तरों की मुक्ति मिलती है। मान्यता है कि ब्रह्मा जी की प्रार्थना से भगवान विष्णु फल्गु रूप धारण किए। दक्षिणाग्रि में ब्रह्मा जी द्वारा हवन किए जाने पर फल्गु तीर्थ की उत्पत्ति हुई। अखिल ब्रहांड में जितने भी तीर्थ हैं, वे सब पितृ पक्ष में देवताओं के साथ फल्गु तीर्थ में नित्य स्नान करने आते हैं।
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पितृत्व के प्रति सच्ची श्रद्धा का प्रतीक है श्राद्ध

पूंडरी। पंडित रवि दत्त शास्त्री श्राद्ध पितृत्व के प्रति सच्ची श्रद्धा का प्रतीक हैं। सनातन धर्म के अनुसार प्रत्येक शुभ कार्य शुरू करने से पहले में मां-बाप तथा पितृगण को प्रणाम करना हमारा धर्म है। हमारे पुरखों की वंश परंपरा के कारण ही हम आज जीवित रहे हैं। सनातन धर्म के मतानुसार हमारे ऋषि मुनियों ने हिंदू वर्ष में संपादित 24 पक्षों में से एक पक्ष को पितृपक्ष अर्थात श्राद्धपक्ष का नाम दिया। पितृगण की आत्मा को मुक्ति तथा शांति प्रदान करने हेतु विशिष्ट कर्मकांड को ‘श्राद्ध’ कहते हैं।

पंडित के अनुसार
पूर्णिमा का श्राद्ध 29 सितंबर को होगा। 14 अक्तूबर दिन शनिवार को सर्व पितृ श्राद्ध संपन्न हो जाएंगे। चतुर्थी तिथि शय होने के कारण चतुर्थी का श्राद्ध दो अक्तूबर को होगा। वर्ष 2028 में श्राद्धों की सोमवती अमावस्या होगी, उसमें ही फल्गु का विशेष महत्व होगा। -आचार्य पंडित राम भगत हरित, राजौंद।
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