जींद। देश में 25 जून 1975 को लागू की गई इमरजेंसी लोकतंत्र के इतिहास का ऐसा अध्याय है, जिसे आज भी कई लोग काले दौर के रूप में याद करते हैं। इस दौर को झेलने वालों में गांव थुआ निवासी ओमप्रकाश भी शामिल थे, जिन्होंने आठ माह तक जेल में रहकर कठिन परिस्थितियों का सामना किया।
इमरजेंसी के दौरान राजनीतिक और सामाजिक गतिविधियों से जुड़े लोगों पर सख्त कार्रवाई की गई थी। जींद जिले में भी इसका व्यापक असर देखने को मिला और 23 लोगों को जेल भेजा गया था।
उस समय ओमप्रकाश राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) में नगर कार्यवाह के पद पर थे। प्रशासन ने उन पर डाकघर में आग लगवाने और बिजलीघर को नुकसान पहुंचाने जैसे गंभीर आरोप लगाते हुए डिफेंस ऑफ इंडिया रूल्स (डीआईआर) के तहत मामला दर्ज किया था।
गिरफ्तारी के बाद उन्हें जेल भेज दिया गया, जहां उन्होंने करीब आठ माह तक कारावास भोगा। ओमप्रकाश बताते हैं कि इमरजेंसी के दौरान विरोध की आवाजों को दबाने के लिए बड़े स्तर पर गिरफ्तारियां की गई थीं। राजनीतिक कार्यकर्ताओं, सामाजिक संगठनों से जुड़े लोगों और सरकार की नीतियों का विरोध करने वालों को निशाना बनाया गया।
जिले के कई अन्य भाजपा और जनसंघ से जुड़े कार्यकर्ताओं पर भी मीसा (मेंटेनेंस ऑफ इंटरनल सिक्योरिटी एक्ट) और अन्य कानूनों के तहत मुकदमे दर्ज किए गए थे। इमरजेंसी समाप्त होने के बाद इन मामलों पर चर्चा हुई और लोकतांत्रिक अधिकारों की बहाली के साथ बंदियों को रिहा किया गया।
आज भी ओमप्रकाश जैसे लोग उस दौर को लोकतंत्र की सबसे कठिन परीक्षा के रूप में याद करते हैं। उनका कहना है कि लोकतंत्र की मजबूती के लिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और नागरिक अधिकारों का संरक्षण बेहद जरूरी है।