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पंद्रह साल इंतजार के बाद यहां पांडवों ने किया था पितरों के लिए पिंडदान

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जींद स्थिति तीर्थस्‍थली पांडु पिंडारा का सरोवर। संवाद। - फोटो : Jind
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महाभारत युद्ध के बाद पांडवों ने अपने पितरों का पिंडदान जींद के पिंडारा तीर्थस्थल पर किया ही किया था। इसके लिए उनको करीब 12 वर्षों का इंतजार करना पड़ा, जब सोमवती अमावस्या का योग मिला तो उन्हाेंने अपने पुरखों का तर्पण व पिंडदान किया। आज भी श्राद्धपक्ष में यहां पिंडदान व तर्पण करने के लिए दूर-दूर से श्रद्धालु आते हैं। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार तीर्थ भूमि गया के समकक्ष यहां भी पितरों के तर्पण व दान का महत्व है।
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पिंडारा तीर्थ के महत्व के बारे में पीठाधीश्वर आचार्य राजेश स्वरूप शास्त्री बताते हैं कि पौराणिक ग्रंथों में पिंडारा तीर्थ का जिक्र आता है। पिंडारा तीर्थ को पिंडतारक, सोमतीर्थ व पिंडार्क नाम से जाना जाता है। जयंती (जींद) के पूर्व की ओर करीब तीन मील लंबा यह तीर्थ पितरों के तर्पण के लिए विशेष महत्व रखता है। आचार्य राजेश स्वरूप शास्त्री बताते है कि धार्मिक मान्यता है कि जब पितामह भीष्म बाणों की शैय्या पर थे, तब धर्मराज युधिष्ठिर ने उनसे पितरों को मुक्ति के लिए उपाय पूछा था। इस पर गंगा पुत्र भीष्म ने पिंडारा तीर्थ में स्नान कर पिंडदान करने के लिए कहा था। शास्त्रों के अनुसार मंकण ऋषि ने सूर्य के बताने पर अपने पितरों के उद्धार के लिए पिंडारा तीर्थ पर पिंडदान किया।
गया तीर्थक्षेत्र के समकक्ष है पांडु पिंडारा
तीर्थक्षेत्र गया में पितरों के तपर्ण व दान का जो महत्व है, वही पिंडारा में है। पांडवों ने पितरों के लिए जब पिंडारा में पिंडदान किया। तभी से इसका नाम पांडू पिंडारा पड़ा है। यहां तीर्थ पर प्रदेश के साथ-साथ देश के अन्य हिस्सों से भी लोग पिंडदान करने आते हैं। शास्त्रों के अनुसार कोई भी व्यक्ति अपनी तीन पीढ़ियों के लिए यहां पिंडदान कर सकता है। इसमें पिता, दादा व परदादा शामिल हैं।
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