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टीकरी बार्डर पर 10 महीने होने को हैं पूरे, धैर्य अब भी उतना ही

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पंजाब से किसानों के आने का सिलसिला रहा जारी। - फोटो : Bahadurgarh
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कृषि उत्पादन व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सुविधा) विधेयक 2020, मूल्य आश्वासन एवं कृषि सेवाओं पर कृषक (सशक्तिकरण एवं संरक्षण) अनुबंध विधेयक 2020 और आवश्यक वस्तु संशोधन बिल को वापस लेने की मांग को लेकर एक साल पहले पंजाब से शुरू हुआ किसान आंदोलन हरियाणा दिल्ली के टीकरी बार्डर पर भी अनवरत जारी है। यहां धरना पिछले साल 26 नवंबर को शुरू हुआ था। एक साल होने के बावजूद किसानों में धैर्य की कमी नहीं है।
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17 सितंबर 2020 को लोकसभा में अध्यादेश पारित होने के साथ ही पंजाब में आंदोलन शुरू होने के बाद 25 नवंबर को पंजाब और हरियाणा के किसान संगठनों ने दिल्ली के लिए कूच किया। 26 को दिल्ली पुलिस ने कोविड-19 प्रोटोकॉल का हवाला देते हुए राजधानी में प्रवेश नहीं करने दिया तो किसान टीकरी बार्डर पर बहादुरगढ़ में धरना देकर बैठ गए। कई दौर की बातचीत के बाद भी सरकार ने आंदोलनकारियों की बात नहीं मानी तो 8 दिसंबर को भारत बंद का आह्वान किया। छह फरवरी 2021 को किसानों ने दोपहर 12 बजे से दोपहर 3 बजे तक तीन घंटे के लिए देशव्यापी चक्का जाम किया। जुलाई 2021 में संसद सत्र के समानांतौ संयुक्त किसान मोर्चा ने जंतर मंतर पर किसान संसद चलाई। टीकरी बार्डर से भी हर रोज किसान नेताओं ने दिल्ली में हुई किसान संसद में भाग लिया।
टीकरी बार्डर पर आंदोलन की अवधि में कई मौके ऐसे भी आए जब यहां आंदोलनकारियों की संख्या 40 हजार से भी अधिक हुई और लालकिले की घटना के तुरंत बाद स्थिति ऐसी भी हुई कि यहां दो हजार से भी कम किसान रह गए थे। फिलहाल किसानों के इस पड़ाव में आंदोलनकारियों की बहुत अधिक भीड़ भले ही नहीं है लेकिन नौ हजार से अधिक किसानों की मौजूदगी आंदोलन की मजबूती को बया भी कर रही है।
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पिछले साल 26 नवंबर के कुछ दिन बाद किसानों का काफिला टीकरी बार्डर से करीब अढ़ाई किलोमीटर दूर बहादुरगढ़ बस स्टैंड तक, सेक्टर-9 मोड़ से जाखौदा गांव के आगे तक पहुंच गया। सेक्टर-9 और 13 में भी किसानों के तंबुओं का जो काफिला पहुंचा था वो आज भी कम नहीं हुआ है। किसानों की भलाई के लिए नौ महीने आंदोलन चलाने वाले शहीद-ए-आजम भगत सिंह के चाचा अजीत सिंह से आंदोलनकारी किसान आज भी प्रेरणा लेते हैं। किसानों के इस करीब 20 किलोमीटर लंबे पड़ाव में बीच-बीच में कहीं-कहीं ट्रालियां व झोंपड़ियां भले ही हट गई हों मगर किसानों की संख्या इतनी कम नहीं हुई है कि आंदोलन को कम आंका जा सके।
आंदोलन को एक साल पूरा होने के मौके पर टीकरी बार्डर पर किसानों की सभा हुई। सभा को विभिन्न संगठनों के नेताओं ने संबोधित किया। किसानों ने एकाग्रता से सुना। सालभर बाद भी किसानों के टीकरी बार्डर पड़ाव में जगह-जगह किसान टोलियों में चर्चा करते हुए, आराम फरमाते हुए या अपने रोजमर्रा के काम करते हुए देखे गए। अपने टेंट के बाहर खड़े पानी के टैंकर को ठीक करते पंजाब के जिला बठिंडा के कुलविंदर सिंह ने कहा कि परिश्रम करने में मजा आता है। इससे हमें ताकत मिलती है। हम अपना काम खुद करते हैं।
शनिवार को भी किसानों के मीलों लंबे इस पड़ाव में खूब हलचल रही। कोई कार से आ-जा रहा था। कोई चाय की चुस्की ले रहा था तो कोई अपनी यूनियन के झंडे को संवार रहा था। नयागांव चौक के पास भाकियू एकता (उगराहां) की सभा में जोश की कमी नहीं थी। महिलाएं अब भी अपने हकों के लिए पूरे धैर्य के साथ आंदोलन में डटे रहने को तैयार हैं। मानसा की राजबीर कौर ने कहा कि बारह महीने तो क्या बारह साल भी हो जाएं तो भी चिंता नहीं। कानून वापस होंगे तभी घर जाएंगे।
ऑल इंडिया किसान खेत मजदूर संगठन के प्रदेश सचिव जयकरण मांडौठी ने बताया कि ऐतिहासिक किसान आंदोलन को एक साल हो गया है। हमारे सुसंगठित किसान आंदोलन को सरकार हरा नहीं पाएगी। व्यापारी हितैषी तीनों कृषि कानूनों को रद्द करना होगा, सभी फसलों का सी-2 प्लस 50 परसेंट एमएसपी देकर खरीद की गारंटी देनी होगी, 2021 का बिजली बिल वापस लेना होगा। -जयकरण, सचिव, एआईकेकेएमएस।
इस आंदोलन ने सभी राज्यों के किसानों को जगा दिया है। अब हिमाचल के किसान भी आंदोलन के साथ चलने के लिए तैयार हो गए हैं। करनाल केस ने प्रदेश सरकार के इस भ्रम को भी मिटा दिया है कि ये मुट्ठी भर किसान हैं। -काका सिंह, भाकियू, पंजाब।
शहीद भगत सिंह के चाचा शहीद अजीत सिंह ने 1907 में आंदोलन किया था। तब अंग्रेजों की सरकार को खेती बचाव के कानून बनाने पड़े थे। हम भी अजीत सिंह के वंशज हैं। भाजपा सरकार को मानना ही पड़ेगा? -कुलवंत सिंह, मौलवी वाला, पंजाब।
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