हिसार। रूस और यूक्रेन की जंग के चलते खारकीव शहर को खाली करने की एडवाइजरी और रूस के न्यूक्लियर बम की धमकी से सहमे भारतीय विद्यार्थी जान हथेली पर रख शहर छोड़ रहे हैं। खारकीव में फंसे हिसार के छात्र अंशुमन ने बताया कि यूूक्रेन सरकार द्वारा भारतीयों को खारकीव छोड़ने को कहा गया है। उसके बाद यहां फंसे विद्यार्थी दहशत के माहौल में बंकर से बाहर निकले और रेलवे स्टेशन पहुंचे। इस दौरान काफी बमबारी हो रही थी। जैसे तैसे कर रेलवे स्टेशन पर पहुंचे तो वहां पर खड़े स्थानीय लोगों ने हमें ट्रेन के अंदर नहीं घुसने दिया। इस दौरान भारतीय दूतावास से भी संपर्क किया लेकिन कोई मदद नहीं मिली। उसके बाद सभी ने निर्णय लिया कि पैदल चलते हैं।
अंशुमन ने बताया कि इस सफर के दौरान बमबारी और गोलियां चल रही थी। किसी ने हिम्मत नहीं हारी और हौसले के साथ आगे बढ़ते रहे। करीब पांच घंटे पैदल चल बीस किलोमीटर का सफर तय कर पिसोचीन सुरक्षित जगह पर पहुंच गए हैं। अभी यह रुके हैं, क्योंकि आगे जाने की अभी कोई व्यवस्था नहीं हो सकी है।
दो दिन से स्लोवाकिया में, फ्लाइट कब चलेगी पता नहीं : खुशी
हिसार की रहने वाली खुशी ने बताया कि दो दिन पहले कीव शहर छोड़ने के बाद हंगरी के पास स्लोवाकिया जगह पर पहुंचे हैं। दो दिन से यहीं पर रुके हैं। यूक्रेन दूूतावास उनकी मदद कर रहा है। उनके ठहरने और खाने की व्यवस्था की हुई है। खुशी के परिजनों ने बताया कि वहां पर रुके हुए बच्चों का रजिस्ट्रेशन हो चुका है। फ्लाइट कब चलेगी इस बारे में कुछ नहीं पता। वहां पर नेटवर्क की कमी के कारण खुशी से बातचीत कम हो रही है। बाकी वहां पर बच्चे सुरक्षित है।
अपनों से मिले का झलका दर्द : नाइजीरियन लड़कियों ने आगे नहीं जाने दिया, भूखे-प्यासे ढाई दिन लाइन में लगे रहे
यूक्रेन से स्वदेश लौटी नलवा गांव की रहने वाली सालिका सहरावत ने बताया कि वह यूक्रेन के टरनोपिल शहर में मेडिकल यूनिवर्सिटी से एमबीबीएस कर रही है। 24 फरवरी की सुबह जहां हम रुके हुए थे उसके पश्चिम में बमबारी शुरू हो गई। वहां पर रहने वाले सभी विद्यार्थी घबरा गए। अगले दिन सुबह हॉस्टल छोड़ दिया। एक मिनी बस के जरिये रोमानिया बॉर्डर के लिए निकले। बस वाले ने करीब छह किलोमीटर दूर उतार दिया। उसके बाद छह किलोमीटर पैदल चलकर बॉर्डर पहुंचे। सालिका ने बताया कि तीन बार गेट के पास पहुंचने के बाद वापस भेज दिया। एक बार तो नाइजीरियन देश की लड़कियां घेरा बनाकर खड़ी थी। उन्होंने कहा कि पहले हम जाएंगे उसके बाद तुम्हारा नंबर आएगा। उनके कारण दोबारा लाइन में लगना पड़ा। ढाई दिन तक लाइन में खड़े रहे। बर्फबारी के कारण शरीर ने जवाब देना शुरू कर दिया। भूखे-प्यासे लाइन में लगे रहे। वहां पर सरकार और भारतीय दूतावास ने रहने और खाने की व्यवस्था की। दो दिन के बाद हवाई जहाज में बैठे। वीरवार देर शाम को सालिका हिसार पहुंची। वहीं डाबड़ा गांव की आयुषी मोहिला भी वीरवार को अपने घर पहुंच गई।
वहीं, सिरसा मार्ग पर हाउसिंग बोर्ड कॉलोनी में रहने वाले निखिल ने बताया कि वह यूक्रेन की मेडिकल यूनिवर्सिटी से एमबीबीएस कर रहा है। जब युद्ध शुरू हुआ वहीं पर था। 26 फरवरी को दोपहर बाद वहां से रोमानिया बॉर्डर के लिए निकले। फिर बॉर्डर पार करने के लिए लाइन में लगे। 27 को बॉर्डर पार कर दिया। रोमानिया में एक एनजीओ ने मदद की। विद्यार्थियों की ठहरने की व्यवस्था एक स्पोर्ट कांप्लेक्स में ली। कल रात को 12 बजे रोमानिया के एक शहर से फ्लाइट चली। सुबह 11 बजे दिल्ली एयरपोर्ट पर पहुंचे और शाम को अपने घर हिसार पहुंच गया।