वन हेल्थ कार्यक्रम को कामयाब करने के लिए मेडिकल सेक्टर और वेटरनरी सेक्टर का मिल कर काम करना जरूरी है। सहायक महानिदेशक पशु स्वास्थ्य नई दिल्ली डॉ. अशोक कुमार ने बताया कि वन हेल्थ का महत्वपूर्ण उद्देश्य इको सिस्टम को साथ लेकर चलना है। जब तक इको सिस्टम सही है तब तक प्लेनेट स्वस्थ है। कई बार विभाग एकांत में काम करते हैं, जिसमें से कुछ संसाधन मेडिकल के पास है। विभिन्न सेक्टर हैं जो अलग- अलग काम न करके साथ मिलकर काम करें जिससे इको सिस्टम का संतुलन बना रहे।
लुवास में पशुचिकित्सा एवं जनस्वास्थ्य एवं महामारी विज्ञान विभाग एवं भारतीय पशुचिकित्सा जनस्वास्थ्य विशेषज्ञों के संगठन के संयुक्त तत्वावधान में पशु चिकित्सकों के जनस्वास्थ्य विशेषज्ञों का 19वां अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन वीरवार से शुरू हुआ। इस अवसर पर विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. विनोद कुमार वर्मा ने कहा कि विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के अनुसार पिछले तीन से अधिक दशकों से मनुष्यों में उभरने वाली लगभग 75 प्रतिशत संक्रामक बीमारियां जानवरों, मुख्य रूप से वन्यजीव प्रजातियों से उत्पन्न हुई हैं।
ये जूनोटिक बीमारियां अत्यंत महत्वपूर्ण समस्याएं पैदा करती हैं और वैश्विक स्वास्थ्य सुरक्षा और आर्थिक कल्याण के लिए भी खतरा है। ब्रुसेलोसिस, टीबी, इबोला, सार्स और एवियन इन्फ्लूएंजा जैसे जूनोटिक रोगों की रोकथाम के लिए वन हेल्थ दृष्टिकोण अपनाना अब समय की मांग बन चुका है। सम्मेलन की मुख्यातिथि व अग्रोहा मेडिकल कॉलेज की निदेशिका डॉ. अलका छाबड़ा ने कहा कि वन हेल्थ के कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए वेटरनरी और मेडिकल प्रोफेशनल को कंधे से कंधा मिलाकर चलना आवश्यक है। विशिष्ट अतिथि सहायक महानिदेशक पशु स्वास्थ्य, नई दिल्ली डॉ. अशोक कुमार ने बताया कि आज के महामारियों के युग में वन हेल्थ की अवधारणा से ही संक्रमित रोगों से बचा जा सकता है।
सम्मेलन के पहले दिन चार तकनीकी सत्रों का आयोजन किया गया। पहले सत्र में डॉ. नवनीत ढंड (यूनिवर्सिटी ऑफ सिडनी ऑस्ट्रेलिया) ने बताया कि कैसे हम महामारी विज्ञान क्षमता को सुदृढ़ बनाकर ट्रांसबाउंड्री और उभरते हुए नए संक्रमित रोगों का निदान कर सकते हैं। दूसरे सत्र में डॉ. जेपीएस गिल ने मानव और पशु दोनों में एंटीबायोटिक दवाओं का अत्यधिक उपयोग और दुरुपयोग के कारण रोगाणुरोधी प्रतिरोध पर चर्चा की। उन्होंने कहा कि एंटीबायोटिक के अत्यधिक उपयोग के कारण इन दवाइयों का असर कम होता जा रहा है और यह एक वैश्विक खतरे के तौर पर उभर रहा है।
तीसरे सत्र में प्रो. सिमोन मोर (यूनिवर्सिटी कॉलेज डबलीन, आयरलैंड) ने पशु स्वास्थ्य में अंतरराष्ट्रीय नीति को सही और प्रभावी ढंग से बनाने के लिए वैज्ञानिकों में जनहित अनुसंधान के प्रति प्रतिबद्धता होना बहुत जरूरी है। चौथे सत्र में मुर्गी विशेषज्ञ डॉ. एनके महाजन ने बताया कि एवियन इन्फ्लूएंजा(बर्ड फ्लू) दुनिया भर में पोल्ट्री उद्योग, वन्य जीवन और सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए एक महत्वपूर्ण चिंता का विषय बना हुआ है। पशु चिकित्सा, मानव स्वास्थ्य और वन्य जीवन के बीच निरंतर अनुसंधान, निगरानी के लिए वन हेल्थ के तहत एक प्राधिकरण इस वायरस से जुड़े जोखिमों की निगरानी और उन्हें कम करने के लिए बनाए जाने की जरूरत है।
इस अवसर पर पूर्व कुलपति महाराष्ट्र विश्वविद्यालय डॉ. आशीष पातुरकर को लाइफ टाइम अचीवमेंट अवॉर्ड से नवाजा गया व पांच वैज्ञानिक डॉ. टीश्री निर्वासन राय, डॉ. रणधीर सिंह सैनी, डॉ. एसके नागपा, डॉ. शरण गौड़ा पाटिल और डॉ. समीर दास को इंडियन एसोसिएशन ऑफ वेटरनरी पब्लिक हेल्थ फेलो अवॉर्ड से सम्मानित किया गया।