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Hisar: फुटबाल किट खरीदने को नहीं थे रुपये; अब राष्ट्रीय स्तर पर जीत रहीं सोना, पड़ोसी भी देने लगे सम्मान

Wed, 17 Jan 2024 10:59 AM IST
नवीन दलाल अश्वनी कुमार, हिसार (हरियाणा)

सार

पड़ोसी तंज कसते थे - पहनने को जूते नहीं, चली हैं फुटबालर बनने। लेकिन बेटियां तानों से विचलित नहीं हुई, उन्होंने इसे चुनौती मान लिया। बेटियों की खेल में रुचि देखकर परिवार ने भी साथ दिया और लगन व अभ्यास ने बेटियों को राष्ट्रीय स्तर पर पहुंचा दिया।
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ममता, रीनू और किरण - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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हिसार के आदमपुर का चूली बागड़ियान अब फुटबाॅलर बेटियों के गांव के नाम से चर्चित है। यहां की बेटियां राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर पर फुटबाल खेलकर गांव का नाम रोशन कर रही हैं। पदक जीतकर गांव लौटने पर ग्रामीण सम्मानित भी करते हैं। 9 साल पहले स्थिति इसके विपरीत थी। जब बेटियों ने खेलना शुरू किया था तो इनके पास जूते तक नहीं थे। स्कूल ड्रेस में ही बेटियां अभ्यास करती थीं। परेशानी सिर्फ आर्थिक तंगी की होती, तो बात और थी।

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पड़ोसियों के ताने सहे, अब पदक जीतकर नाम कर रही रोशन
पड़ोसी तंज कसते थे - पहनने को जूते नहीं, चली हैं फुटबालर बनने। लेकिन बेटियां तानों से विचलित नहीं हुई, उन्होंने इसे चुनौती मान लिया। बेटियों की खेल में रुचि देखकर परिवार ने भी साथ दिया और लगन व अभ्यास ने बेटियों को राष्ट्रीय स्तर पर पहुंचा दिया। आज बेटियां राष्ट्रीय स्तर पर पदक जीतकर लौटती हैं तो तंज मारने वाले पड़ोसी साथ में जीत का जश्न मनाते हैं। गत शनिवार को इन बेटियों ने पश्चिम बंगाल के मेदिनापुर में हुई ऑल इंडिया इंटर यूनिवर्सिटी चैंपियनशिप में अमृतसर की गुरु नानक देव यूनिवर्सिटी को हराकर स्वर्ण पदक जीता तो गांव में विजेता की तरह स्वागत किया गया।

पदक जीतकर लौटीं इन बेटियों का कहना है कि आर्थिक तंगी के कारण जब फुटबाल किट नहीं खरीद सकी थीं तो कोच विनोद कुमार ने उनकी काफी मदद की और खेल सामग्री दिलवाई। मेरे जैसी खिलाड़ियों को नेशनल स्तर और इंटरनेशनल स्तर तक पहुंचाने में इनका बड़ा हाथ है। किसान और गरीब परिवार की ये फुटबॉलर बेटियां रोज सुबह जाट कॉलेज तो शाम को अपने गांव चूली बागड़ियान में ही कोच विनोद कुमार के पास प्रशिक्षण ले रही हैं। फुटबॉलर बेटियां जाट कॉलेज की छात्रा हैं।
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बेटियों की जुबानी, संघर्ष की कहानी
जब मैंने फुटबाल खेलनी शुरू की तो आसपास के लोगों ने मुझे खेलने से मना कर दिया था। मेरे माता-पिता को कहने लगे कि बेटियों को बाहर मत भेजो जमाना ठीक नहीं है, लेकिन माता-पिता मेरे फैसले के साथ मजबूती से डटे रहे। कोच ने भी मुझे खेलने के लिए प्रेरित किया। अब मेरा सपना अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वर्ण पदक जीतना है। पिछले साल मैंने खेलो इंडिया में स्वर्ण और ऑल इंडिया इंटर यूनिवर्सिटी चैंपियनशिप में कांस्य पदक जीता था। -ममता, राष्ट्रीय खिलाड़ी

मैंने 9 साल पहले फुटबाल से अपने कॅरिअर की शुरुआत की थी। उस समय परिवार की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी। मेरे पास किट खरीदने के लिए भी पैसे नहीं थे। टी-शर्ट और साधारण जूते पहनकर प्रैक्टिस शुरू की तो आस-पड़ोस के लोगों ने टोकना शुरू कर दिया। मगर माता-पिता मुझे आगे बढ़ाते रहे। अब मैं फरवरी में गुवाहटी में होने वाला खेलो इंडिया में हिस्सा ले रही हूं। -किरण, राष्ट्रीय खिलाड़ी

मैं तीन बार नेशनल खेल चुकी हूं। जब मैंने फुटबाल शुरू की तो काफी परेशानी आई। आर्थिक तंगी के कारण काफी समय तक स्कूल ड्रेस में ही प्रैक्टिस शुरू की। पहली बार कोच विनोद कुमार ने मुझे खेल किट खरीदकर दी तो मैदान में जाना शुरू किया। आज भी मुझे परिवार के सदस्य फुटबाल खेलने के लिए प्रेरित करते हैं। -रीनू, राष्ट्रीय खिलाड़ी।

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