बीड़ बबरान गांव में महाभारतकालीन पीपल का वृक्ष करीब चार साल पहले अल सुबह तीन बजे अचानक जड़ सहित जमीन पर गिर गया। मान्यता के अनुसार यह वही पेड़ था, जो बर्बरीक और श्रीकृष्ण के संवाद से जुड़ा था, जिसमें बर्बरीक ने एक ही तीर से पेड़ के सभी पत्तों को छेद दिया था। आज भी इस पेड़ के पत्तों में छेद होता है। इस वृक्ष के अचानक गिरने से वहां के पुजारी पं. विनोद शर्मा व मंदिर में रहने वाले अन्य भक्त दौड़ कर आए। पुजारी के अनुसार वे पेड़ को गिरा देखकर हैरान थे, क्योंकि उस समय न आंधी थी न तूफान।
यह भारी भरकम पेड़ गिरने के बाद भी 7-8 माह तक हरा-भरा रहा, लेकिन उसके बाद सूखने लगा। अपने अंदर ऐतिहासिकता और पत्तों में छेद होने की विशेषता समेटे इस पेड़ के गिरने से हर कोई चिंतित था, जिस कारण उसको खड़ा करने के उपाय किए जाने लगे। पुरानी वस्तुओं का रख-रखाव करने वाली विशेष टीम अमृतसर से आई, लेकिन प्रयास असफल रहे। पुजारी पं. विनोद शर्मा के अनुसार हिसार कैंट के एक फौजी अफसर सूरजभान अरोड़ा ने 40-50 हजार रुपये खर्च किए और वन विभाग के अधिकारी व इंजीनियर आदि बुलाकर पेड़ को उसी स्थान पर खड़ा किया गया। हालांकि उसका कुछ हिस्सा काटना पड़ा। पुजारी के अनुसार पेड़ खड़ा करने के बाद उन्हें चिंता थी कि पेड़ फिर से फुटाव करेगा या नहीं। हालांकि खड़ा करने के छह माह बाद (मार्च 2019 में) उसमें फुटाव होना शुरू हो गया। इस पर भी उन्हें चिंता थी कि पेड़ जिस बात के लिए मशहूर था, क्या अब भी उसके पत्तों में छेद होगा या नहीं। फुटाव के कुछ सप्ताह बाद ही पत्तों के बीच फिर से छेद दिखाई देने लगे। आज भी श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं और पत्तों में एक जैसे छेद देखकर इसे भगवान का करिश्मा समझते हैं।
सुविधाओं से वंचित है ऐतिहासिक स्थल
जहां पेड़ है, वहां पर श्याम बाबा का मंदिर बनाया हुआ है, जो करीब आठ साल पहले ही बना है। महाभारत से जुड़े होने और ऐतिहासिकता के बावजूद यहां पर सुविधाएं नहीं हैं। श्रद्धालुओं को बड़ी कठिनाई से यहां तक पहुंचना पड़ता है। हिसार बस स्टैंड से मंदिर करीब 14 किलोमीटर है। नौ किलोमीटर तलवंडी राणा गांव तक सड़क मार्ग बेहतर है, लेकिन उसके बाद लिंक रोड का रास्ता पांच किलोमीटर का है, जो संकरा होने के साथ बीच-बीच में से टूटा हुआ है। इस पर भी 0.6 किलोमीटर का रास्ता तो नाले के साथ का है, जो कच्चा है और धूल उड़ती है।
श्रद्धालुओं की मांग, केडीबी में किया जाए शामिल - (फोटो-07)
मंदिर में हर मंगलवार, शनिवार को हांसी से पहुंचने वाला श्रद्धालु दंपती मनोज और मोनिका का कहना है कि यह ऐतिहासिक जगह है, फिर भी यहां तक पहुंचने के लिए अपना साधन करके आना पड़ता है। मनोज ने कहा कि कुरुक्षेत्र के 84 कोस क्षेत्र को कुरुक्षेत्र विकास बोर्ड (केडीबी) में शामिल किया गया है, लेकिन महाभारत से जुड़े इस ऐतिहासिक स्थान की ओर ध्यान नहीं दिया जा रहा है। सरकार को इसे केडीबी में शामिल कर इसका विकास कराना चाहिए।
कुएं के पास पहुंची जड़ से हुआ फुटाव - (फोटो-09)
खास बात यह है कि जहां यह ऐतिहासिक पेड़ है, उसके मात्र 10 फुट की दूरी पर एक और पीपल का पेड़ है, लेकिन इस पेड़ के पत्ते बिलकुल साफ आते हैं, जिनमें कोई छेद नहीं है। इसके विपरीत पेड़ से करीब 20 मीटर दूर मंदिर परिसर में पुराना कुआं है, जिसके पास मुख्य पेड़ की जड़ें पहुंची हुई थीं और उन जड़ों में से दीवार से फुटाव हो गया, जिसमें से एक टहनी बाहर निकल आई, उस पर लगे पत्तों में भी छेद हैं।
पीपल के पेड़ के पत्तों में आज भी छेद - (फोटो-08)
विज्ञान की इस दुनिया में आज यह किसी चमत्कार से कम नहीं है कि इस पीपल के पेड़ के पत्तों में आज भी छेद रहता है। पेड़ पर जब नए पत्ते आते हैं तो वह साबुत होते हैं, लेकिन ज्यों-ज्यों बड़े होते हैं तो अचानक एक दिन उनमें छेद हो जाता है। वीर बर्बरीक के नाम पर ही गांव का नाम बीड़ बबरान पड़ा है।
महाभारत के अनुसार बर्बरीक भीम का पौत्र
महाभारत की कथा के अनुसार वीर बर्बरीक भीम के पौत्र और घटोत्कच का पुत्र था। वह सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर था और उसे यह वरदान था कि वह एक ही बाण से सामने खड़ी सेना के जवानों को मौत के घाट उतार सकता था। श्रीकृष्ण को जब इस बात का पता चला तो उन्होंने इसी स्थान (बीड़ बर्बरीक) पर उसे रोक लिया। महाभारत कथा के अनुसार श्रीकृष्ण ने वीर बर्बरीक को पीपल के पेड़ के सभी पत्ते एक ही तीर से छेद करने को कहा। वीर बर्बरीक ने तीर चलाया तो एक-एक करके तीर पत्तों को छेदता चला गया और श्रीकृष्ण के पैर के पास आकर रुक गया। इस पर बर्बरीक ने कहा कि प्रभु आपके पैर के नीचे एक पत्ता दबा हुआ है। कृपया पैर हटा लें, क्योंकि मैंने तीर को पत्तों को छेदने की आज्ञा दी है, आपके पैर को नहीं। श्रीकृष्ण ने पैर हटाया तो तीर ने उस आखिरी पत्ते को भी छेद दिया था।
खाटू श्याम के नाम से जाने गए बर्बरीक
महाभारत की कथा के अनुसार बर्बरीक ने श्रीकृष्ण को गुरु मानकर शिक्षा ग्रहण की थी। यह जानकर श्रीकृष्ण ने उससे गुरु दक्षिणा के रूप में उसका शीश मांग लिया था और बर्बरीक ने अपना शीश काटकर उन्हें दे दिया था। इस पर श्रीकृष्ण ने उसे वरदान दिया था कि वह उनके नाम से जाना जाएगा, जिसके बाद खाटू श्याम के नाम से बर्बरीक को जाना जाता है।
वर्जन
यह पेड़ में किसी जेनेटिक कारण से हो सकता है, लेकिन जांच का विषय है। पेड़ की जांच की जाएगी और जांच के बाद ही इसके बारे में विस्तार से बताएंगे।
डॉ. आरएस ढिल्लो, विभागाध्यक्ष, वानिकी विभाग, एचएयू, हिसार।