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आजादी के सिपाही का दो टूक, ऐसा सम्मान मंजूर नहीं

Tue, 20 Aug 2013 12:07 AM IST
अंबाला/ब्यूरो
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आजाद की लड़ाई में अपना अहम योगदान देने वाले स्वतंत्रता सेनानियों के साथ इस बार अंबाला शहर में आयोजित 15 अगस्त के समारोह के दौरान जो बर्ताव हुआ, उससे बापू के ही एक सिपाही देवदत्त राकेश का गुस्सा फूट गया।
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समारोह में स्वतंत्रता सेनानियों के साथ हुए अपमान की कसक देवदत्त राकेश चार दिन से दिल में दबाए बैठे थे लेकिन सोमवार को उनका गुस्सा फूट पड़ा और उन्होंने कार्यक्रम स्थल पर वित्तमंत्री से मिले सम्मान को कूरियर से डीसी अंबाला को वापस भेज दिया।

उन्होंने डीसी आपत्ति जताते हुए कड़ा पत्र भी लिखा है।

15 अगस्त को अंबाला शहर अनाज मंडी में वित्तमंत्री हरमोहिंदर सिंह चट्ठा से जिला प्रशासन ने जिले के आठ स्वतंत्रता सेनानियों और 65 स्वतंत्रता सेनानियों के आश्रितों और युद्ध वीरांगनाओं को सम्मानित कराया था लेकिन वहां जिस तरह से इन लोगों को सम्मान दिलवाया गया उससे वयोवृद्ध स्वतंत्रता सेनानी देवदत्त राकेश बहुत नाराज हुए।
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इसलिए खफा हैं बापू के सिपाही
देवदत्त राकेश ने बताया कि वे कई साल बाद इस जिला स्तरीय स्वतंत्रता समारोह में गए थे। समारोह में स्वतंत्रता सेनानियों का अपमान हुआ। उनके अनुसार पहले तो जिला प्रशासन ने किसी भी स्वतंत्रता सेनानी को समारोह में आने का निमंत्रण ही नहीं भेजा।

जब प्रशासन के इस रवैये पर हरियाणा प्रदेश स्वतंत्रता संग्राम सेनानी परिवार जनकल्याण समिति ने एतराज जताया तो रात में ही सभी स्वतंत्रता सेनानियों व उनके आश्रितों के घर न्योता भिजवाया गया।

वे समारोह में पहुंचे तो वहां एक साइड में आठ स्वतंत्रता सेनानियों और 65 स्वंत्रता सेनानियों के आश्रितों को बिठा दिया गया।

उसके बाद जब वहां वित्तमंत्री को भाषण व सांस्कृतिक कार्यक्रम खत्म हो गया तब सभी स्वतंत्रता सेनानियों व उनके आश्रितों को एक लाइन लगाकर धीरे-धीरे वित्तमंत्री के मंच की ओर बढ़ने को कहा गया।

वित्तमंत्री कतार में सरक रहे स्वतंत्रता सेनानियों व उनके आश्रितों को शाल पकड़ाते रहे और कर्मचारी उन्हें कतार में ही आगे बढ़ाते रहे।

सम्मान में दो शब्द भी नहीं कहे
देवदत्त राकेश के अनुसार वहां मंच पर किसी स्वतंत्रता सेनानी के संघर्ष व उनकी पहचान के बारे में दो लाइनें तक नहीं बोली गईं।

इसी वजह से वहां बैठे अधिकतर लोगों व श्रोताओं को तो यह भी नहीं मालूम चला कि कतार में लगकर ‘भंडारे’ की तरह सम्मान पाने वाले कौन हैं।

उनके अनुसार सम्मान देते हुए यह भी गौर नहीं किया गया कि सम्मान में जो शॉल पुरुष स्वतंत्रता सेनानी या उनकी पत्नी या बेटी (महिला) को दी जा रही है, वह शॉल पुरुष की है या लेडीज।

जो शॉल हाथ में आ रही थी, वही आगे थमाकर सिर्फ सम्मान के नाम पर खानापूर्ति की जा रही थी। उन्होंने बताया कि वे चार दिन से इसी बात को लेकर परेशान थे, मगर अब सम्मान डीसी को वापस भिजवाकर उनके दिल का बोझ कम हो गया है।

तीन जेलों में रहे हैं देवदत्त राकेश
बापू की फौज के सिपाही देवदत्त राकेश के पिता टिक्काराम भी स्वतंत्रता सेनानी थे। वे भी महात्मा गांधी के साथ चले और स्वतंत्रता आंदोलनों में भाग लिया। उन्होंने 1930, 1932 और 1942 में आठ साल तक जेल काटी।

अपने पिता को ही देखते हुए देवदत्त राकेश भी जवानी में ही 1940 में स्वतंत्रता आंदोलन में कूद गए और 1942 में बापू के साथ भारत छोड़ो आंदोलन में गिरफ्तार हो गए।

उन्हें पहले मुरादाबार, फिर शाहजहांपुर और आखिर में लखनऊ कैंप जेल में रखा गया। आजादी के बाद वे पंजाब के नाभा में मास्टर की नौकरी करने लगे और हरियाणा बनने के बाद वह अपने परिवार के साथ अंबाला में बस गए और आज तक यहीं हैं।

स्वतंत्रता सेनानियों के साथ समारोह में सम्मान दिए जाने के दौरान जो बर्ताव हुआ, वह शोभनीय नहीं था। स्वतंत्रता सेनानियों के संघर्ष के बारे में कम से कम दो शब्द कहकर वहां बैठे लोगों से उनका परिचय तो प्रशासन करवा ही सकता था, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। बस, कतार में लगकर सम्मान बांटना अशोभनीय था।
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-आनंद मोहन शुक्ला, हरियाणा प्रदेश स्वतंत्रता संग्राम सेनानी परिवार जनकल्याण समिति
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