आस्ट्रेलिया स्थित गूगल कार्यालय में फतेहाबाद के नरेंद्र गिल्होत्रा । (फाइल फोटो)
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फतेहाबाद। आजकल हमें किसी भी समस्या का समाधान नहीं मिल रहा होता तो हम गूगल में सर्च करते हैं और हमें मिल जाता है। स्कूल-कालेजों के विद्यार्थी भी अब गूगल की इस सुविधा का धड़ल्ले से लाभ उठा रहे हैं। लेकिन आज से छह-सात साल पहले ऐसा नहीं था। उस वक्त इंटरनेट और गूगल का प्रयोग चुनिंदा लोग करते थे और इंटरनेट इतनी बेतकल्लुफ तरीके से लोगों की पहुंच में नहीं था। लेकिन उस समय हरियाणा के छोटे से शहर फतेहाबाद का एक अध्यापक एक अलग ही धुन में मस्त था और एक मूक-बाधिर बच्ची को पढ़ाने के लिए उसने इंटरनेट और खासकर गूगल का सहारा लिया और उस बच्ची को कामयाबी मिली तो गूगल ने उस अध्यापक की इस सोच को सलाम किया और बाकायदा आस्ट्रेलिया बुलाकर न केवल सम्मानित किया बल्कि गूगल की ओर से सात दिन की ट्रेनिंग दिलवाकर गूगल सर्टिफाइड टीचर का प्रमाणपत्र भी दिया। ये टीचर थे फतेहाबाद के रहने वाले नरेंद्र गिल्होत्रा। नरेंद्र पूरे देश के सबसे पहले अध्यापक थे, जिन्हें गूगल ने इस अवार्ड से नवाजा था। नरेंद्र गिल्होत्रा आजकल भटिंडा में रेड क्लिप चेन आफ स्कूल्स के क्षेत्रीय निदेशक हैं। उनके अंडर चार स्कूल आते हैं जिनकी जिम्मेदारी नरेंद्र के पास है।
गूगल टीचर कहे जाने वाले नरेंद्र गिल्होत्रा का साफ मानना है कि जब आप कक्षाओं के अंदर टेकभनोलॉजी लेकर जाओगे, तभी शिक्षा में क्रांतिकारी बदलाव संभव है। गिल्होत्रा की मानें तो आखिरी बेंच पर बैठने वाले विद्यार्थियों में भी असीमित प्रतिभा हो सकती है, शिक्षक का काम तो उस प्रतिभा को पहचानना है और उसे दुनिया के सामने लेकर लाना है। नरेंद्र गिल्होत्रा की मानें तो जिस दिन वो लास्ट बैंचर्स फ्रंट बैंच पर अपने-आप बैठने लगें तो समझ लीजिये कि टीचर ने अपने हिस्से का काम कर दिया है। उन्होंने ये भी कहा कि विद्यार्थी भी अब अध्यापक में छड़ी वाला मास्टर नहीं बल्कि एक दोस्त ढूंढता है, अध्यापकों को भी विद्यार्थियों के अंदर की थ्योरी को समझकर उस पर प्रेक्टिकल करना है।