पंचायती चुनावों की घोषणा के तुरंत बाद ये फैसला पंचायत चुनावों में कांग्रेस के समीकरणों को बिगाड़ सकता है।
बिजली बिलों की बढ़ोतरी, धान के कम दाम और गिरदावरी में देरी के साथ पिछले एक साल में सीएम का रतिया में एक बार भी न आना सहित अनेकों ऐसे मुद्दे थे जिसके सहारे कांग्रेस पंचायत चुनावों की वैतरणी पार करने का ख्वाब देख रही थी।
हालांकि रतिया से प्रो. रविन्द्र बलियाला विधायक हैं। ऐसे में कांग्रेस, खासतौर पर खुद जरनैल सिंह काफी आत्मविश्वास से भरे हुए थे।
ज्ञान चंद ओड के निधन के बाद हुए उपचुनाव में बने थे विधायक, हुडा ने बनाया था चेयरमैन
2009 के विधानसभा चुनावों में इनेलो विधायक ज्ञान चंद ओड के निधन के बाद हुए उपचुनाव में जरनैल सिंह कांग्रेसी उम्मीदवार के रूप में मैदान में उतरे थे।
रतिया उपचुनाव उस वक्त कांग्रेस सरकार के लिए प्रतिष्ठा प्रश्न बन चुका था जिसके लिए तत्कालीन सीएम भूपेन्द्र हुड्डा सहित पूरी की पूरी सरकार रतिया में चुनाव प्रचार के लिए उतर आई थी।
ताबड़तोड़ प्रचार का फायदा भी कांग्रेस को मिला और जरनैल सिंह ने ज्ञान चंद ओड की पत्नी को हरा कर विधानसभा में जगह बनाई थी। सीएम हुड्डा ने जनता से किए वादे के अनुसार जरनैल सिंह को एग्रीकल्चर बोर्ड का चेयरमैन बनाया था।
सीएलयू कांड में नाम उछलने के बाद लगा था साख को बट्टा, विधानसभा चुनाव में तीसरे नंबर पर खिसके
सीएलयू कांड में इनेलो ने जो सीडी जारी की थी, उसमें रतिया के पूर्व विधायक जरनैल सिंह का नाम भी उछला। कांड से पहले जरनैल सिंह की छवि एक ईमानदार राजनेता की थी।
कांड में न उछलने के कारण उनकी साख को काफी नुकसान पहुंचा। इसी का परिणाम था कि 2014 में हुए विधानसभा चुनाव में कांग्रेसी उम्मीदवार के तौर पर चुनाव मैदान में उतरे जरनैल सिंह को मुंह की खानी पड़ी थी। उन्हें तीसरे स्थान से संतोष करना पड़ा। रतिया में बामुश्किल 15 दिन पहले आई बीजेपी उम्मीदवार सुनीता दुग्गल ने उनके वोट बैंक में खासी सेंधमारी की। दुग्गल उस चुनाव में 50 हजार से अधिक वोट हासिल करने में सफल रही थी। ये माना गया कि कांग्रेस को जाने वाला सारा वोट दुग्गल के खाते में चला गया।