परंपरागत खेती से साल में सिर्फ दो बार कमाई होती है। लगभग छह महीने तक फसल पकने का इंतजार करना पड़ता है। मगर सब्जी उत्पादन में न केवल अच्छी कमाई की जा सकती है, बल्कि साल भर रुपये कमाए जा सकते हैं। ऐसा ही करके गांव डांगरा के किसान अच्छी रकम कमा रहे हैं। किसान बलराज पहले परंपरागत खेती करते थे। कभी धान बो लेते थे तो कभी नरमा अथवा कपास। जितनी कमाई होती थी, उतना ही खर्चा हो जाता था। फिर उन्होंने परंपरागत खेती छोड़ कर सब्जी उगाना शुरू किया।
बलराज आज खुद दावा करते हैं कि परंपरागत खेती की तुलना में वह छह गुना अधिक मुनाफा कमा रहे हैं। वह मौसमी सब्जी का उत्पादन कर खुद बाजार में बेचते हैं। लगभग सवा एकड़ जमीन में सब्जी उगाते हैं। बलराज की खास बात ये है कि वह सिर्फ किसान नहीं, बल्कि सब्जी व्यापारी की तरह काम करते हैं। वह सब्जी को मंडी में बेचने की बजाय स्वयं सीधे ग्राहक को बेचते हैं। इससे उनको अधिक लाभ हो रहा है। किसान बलराज बताते हैं कि उनके पास से टोहाना शहर के अलावा आसपास के दर्जन भर से अधिक गांव के लोग सब्जियां खरीदकर ले जाते हैं।
खूब मेहनत करते हैं बलराज
किसान बलराज ने बताया कि वह सुबह 6 बजे अपने खेत में आते हैं। यहां से ताजा सब्जी तोड़ने के बाद स्टाल पर रख दी जाती हैं। फिर शाम तक दुकानदार की तरह काम करते हैं। शाम करीब साढ़े बजे तक सब्जियों को बेचने के बाद घर जाते हैं। उन्होंने बताया कि फिलहाल उन्होंने आधा एकड़ में लौकी, 2 कनाल में करेला, 3 कनाल में तोरी, एक कनाल में कद्दू की सब्जी लगाई हुई है।
परंपरागत खेती में नहीं हुआ फायदा
बलराज ने बताया कि धान व गेहूं की फसल में पानी की खपत अधिक है। इसलिए परंपरागत खेती छोड़ दी। इसलिए वह पिछले सात साल से सब्जियों की खेती कर रहे हैं। धान की फसल में वह 60 से 80 हजार रुपये ही कमा पाते थे। सब्जी उत्पादन से 3 से 4 लाख रुपये कमा रहे हैं। इससे उनका परिवार बढ़िया चल रहा है। बलराज ने बताया कि वह खेत के बाहर सब्जियों को तख्त पर रख लेते हैं। वहां पर शहर से आकर भी लोग सब्जी लेकर जाते हैं। शहर में उनकी खास पहचान बनी हुई है। ग्राहक को यकीन है कि यहां पर ताजा सब्जी मिलेगी। उनके यहां से टोहाना शहर के अलावा पिरथला, पारता, सनियाना, ललौदा, डांगरा, बिढ़ाईखेड़ा आदि गांवों के लोग भी सब्जियां खरीद कर ले जाते हैं।