चरखी गांव निवासी पशुपालक सुखबीर का अपने पशु के प्रति इस तरह का अनोखा प्रेम चर्चा का विषय बना है। दरअसल, राजबीर ने बताया कि उनके पिता रिसाल सिंह के समय यह भैंस उनके घर जन्मी थी। अब करीब 29 साल बाद भैंस मर गई।
परिवार के किसी बुजुर्ग सदस्य की तरह एक पशुपालक ने अपनी भैंस का मरने के उपरांत काज (मृत्युभोज) किया है। पशुपालक सुखबीर का कहना है कि उनके परिवार की तीन पीढ़ियों ने इस भैंस का दूध पीया है और इसके घर आने के बाद से ही परिवार की आर्थिक स्थिति बेहतर हुई। भैंस का काज करने का यह अनोखा मामला चरखी दादरी जिले के चरखी गांव का है।
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चरखी गांव निवासी पशुपालक सुखबीर का अपने पशु के प्रति इस तरह का अनोखा प्रेम चर्चा का विषय बना है। दरअसल, सुखबीर ने बताया कि उनके पिता रिसाल सिंह के समय यह भैंस उनके घर जन्मी थी। अब करीब 29 साल बाद भैंस मर गई। ये भैंस उनके परिवार के लिए शुभ थी और वे इसे परिवार का सदस्य ही समझते थे। राजबीर के अनुसार भैंस ने परिवार को मालामाल कर दिया और अब उसके दम तोड़ने के बाद परिवार ने काज कर उसका सूद चुकाया है।
24 ब्यांत में सभी कटिया जन्मीं
पशुपालक सुखबीर ने बताया कि उनकी भैंस की 24 ब्यांत हुईं और सभी में कटिया को ही जन्म दिया। भैंस की ज्यादातर कटिया उन्होंने पालीं। खास बात ये है कि आज भी इस भैंस की सभी कटिया चरखी गांव में ही अलग-अलग पशुपालकों के पास हैं।
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टेंट के प्रवेश द्वार पर रखी भैंस की फोटो
पशुपालक ने मृत्युभोज कार्यक्रम में सभी रिश्तेदारों, बहन-बेटियों और ग्रामीणों को बुलाया। टेंट में प्रवेश करते ही भैंस की माला डाली हुई एक फोटो रखी गई। इसके बाद भोजन की स्टालें लगवाई गई। इन तमाम व्यवस्थाओं से राजबीर के परिवार का भैंस के प्रति लगाव पता चलता है।