नई शिक्षा नीति 2020 के तहत बालक को खेल-खेल में शिक्षण करवाने पर ज्यादा बल दिया जा रहा है। यही वजह है कि विभाग सरकारी स्कूलों में बाल वाटिका खोल रही है ताकि शुरू से ही बालक के व्यक्तित्व का समुचित विकास हो सके। नई शिक्षा नीति के अंतर्गत पाठ्यक्रम में समरूपता एवं समरसता पर ज्यादा बल दिया गया है।
इसी कड़ी में भाषीय विविधता के अंतर को दूर करने के लिए शिक्षा विभाग राजकीय स्कूलों में तमिल कवि सुब्रह्मण्यम की कविताओं पर आधारित शिक्षण क्रियाएं करवाने जा रहा है। विद्यार्थी कवि सुब्रह्मण्यम की कविताओं से कल्पना, भाव व विचार में सामंजस्य स्थापित करना सीख पाएंगे। पहली से बारहवीं कक्षा के विद्यार्थियों के लिए ये अनिवार्य किया गया है।
शिक्षकों की मानें तो कविता में कवि की कल्पना, भाव एवं विचारों का समावेश होता है। वैसे कविता एवं काव्य को आत्मा की संज्ञा दी गई है। भावात्मकता का संबंध संवेगात्मक विकास से भी होता है ऐसे में विद्यार्थी में सहिष्णुता, सहनशीलता, विनम्रता, सहृदयता, कोमलता, संयम, धैर्य जैसे गुणों का विकास हो सकेगा। ज्ञानेंद्रियों पर नियंत्रण करने की क्षमता में विकास हो सकेगा। इसके लिए विभाग बीआरपी, एबीआरसी व शिक्षकों के सहयोग से तमिल कवि आधारित गतिविधियां करवाई जाएंगी। विभाग कलस्टर, स्कूल स्तर पर इस प्रकार की गतिविधियां करवाएगा।
-विविधता में एकता देश की पहचान
भारत देश में विविधता में भी एकता छुपी हुई है। विभिन्न राज्यों की संस्कृति एवं परंपराएं अलग जरूर हैं, लेकिन इनका संदेश एक ही है। भारतीय संस्कृति की दुनिया में अपनी अमिट छाप है। प्राचीन शिक्षा पद्धति में गुरुकुल शिक्षा पर ज्यादा बल दिया जाता था। इसके तहत शारीरिक, मानसिक,भावात्मक व संवेगात्मक विकास पर ज्यादा फोकस रहता था। स्वामी विवेकानंद, रविंद्रनाथ टैगोर, महात्मा गांधी का शिक्षा दर्शन को आज आधुनिक शिक्षा में भी प्रासंगिक माना जाता है।
एक भारत-श्रेष्ठ भारत के अंतर्गत विभाग का यह सराहनीय प्रयास है। इससे विद्यार्थी में क्षेत्रीय भाषाओं के प्रति रुचि बढ़ेगी। भाषीय भेद को दूर किया जा सकेगा। एक सप्ताह तक सभी स्कूलों में यह विशेष अभियान चलाया जाएगा। आज विद्यार्थी को देश की सभी भाषाओं का ज्ञान होना चाहिए।
-डॉ. महेंद्र सिंह, ब्लॉक रिसोर्स पर्सन