भिवानी। स्कूलों में प्रवेश प्रक्रिया शुरू होते ही किताबों, स्कूल ड्रेस में कमीशन का खेल शुरू हो गया है। इसका बोझ अभिभावकों को झेलना पड़ रहा है।
एनसीईआरटी की पुस्तक नर्सरी तक 300 रुपये तक बिक रही हैं तो निजी प्रकाशकों की पुस्तकें से तीन हजार तक। यानी 10 गुणा तक ज्यादा मार। स्कूल संचालक 40 से 60 फीसदी तक कमीशन फिक्स कर एक ही दुकान से पुस्तकें और ड्रेस खरीदने के लिए अभिभावकों को मजबूर कर रहे हैं। लगभग सभी निजी स्कूलों ने एक-एक दुकान तय कर रखी है। यानी एक लेखक की पुस्तकें तय दुकान को छोड़ किसी अन्य दुकान पर नहीं मिलेंगी। शिक्षा विभाग अधिकारी के एनसीईआरटी की पुस्तकें पढ़ाने का आदेश देकर अपने एसी कार्यालयों में बैठे हैं और बाहर अभिभावकों की जेब पर खुलेआम डाका डाला जा रहा है।
विजिटिंग कार्ड से चल रहा खेल, तय दुकान पर मिल रही पुस्तक
स्कूल संचालक दुकान के विजिटिंग कार्ड के पीछे ही क्लास के बुक सेट लिखकर देते हैं। यानी अभिभावक को विजिटिंग कार्ड वाली दुकान पर ही जाना है। अन्य किसी दुकान पर ये पुस्तकें नहीं मिलेंगी। निजी स्कूलों में पढ़ाने वाले विद्यार्थियों को निजी प्रकाशन की पुस्तकें पढ़ाई जा रही हैं। इसके लिए शहरी और ग्रामीण स्कूल संचालकों ने अपने हिसाब से दुकान चिह्नित की हुई है। अगर कोई दुकानदार पुस्तक और ड्रेस का अधिक रेट बताता है और अभिभावक अन्य किसी दुकान से पुस्तक व ड्रेस लेना चाह रहा है तो उसके मायूस होकर वापस उसी दुकान पर आना होगा, क्योंकि अन्य दुकानों पर उस प्रकाशन की पुस्तक मिलेगी ही नहीं।
18 फीसदी जीएसटी और कोरोना ने बढ़ाई पुस्तकों की कीमत
पुस्तक विक्रेताओं का कहना है कि सरकार कागज पर 18 फीसदी जीएसटी लगा रही है, जिसके कारण कागज व लेबर महंगी हो गई है। साथ ही पेट्रोल-डीजल की कीमतों में लगातार ही उछाल आ रहा है, जिसकी वजह से ट्रांसपोर्ट की दरें भी बढ़ गई हैं। इसके अलावा सरकार की आर से प्रिंटिंग प्रेस पर टैक्स लगाया हुआ है। इन सभी कारणों की वजह से पुस्तकों की कीमत बढ़ी है। पुस्तक विक्रेताओं का यह भी कहना है कि कोरोना संक्रमण की वजह से सरकार ने लॉकडाउन लगा दिया था, जिसके कारण करीब दो साल तक पुस्तक का व्यवसाय काफी नुकसान में चला। इस कारण भी प्रकाशन हाउस ने पुस्तकों की कीमतें बढ़ाई हैं।
एनसीइआरटी की किताबों में नहीं रुझान
अधिकांश निजी स्कूल संचालक राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) की किताबें मंगाने में रुचि नहीं दिखाते। जिले में निजी विद्यालयों में महंगी किताबें पढ़ाई जाती हैं। इन किताबों की कीमत एनसीईआरटी से कई गुना अधिक होती हैं। कई किताबों में तो प्रिंट रेट के ऊपर अलग से प्रिंट स्लिप चिपकाकर प्रकाशित मूल्य से कहीं अधिक वसूली की जा रही है। निजी स्कूलों में कमीशन के चक्कर में हर साल किताबें बदलने के साथ अलग-अलग प्रकाशकों की महंगी किताबें लगाई जाती हैं। अभिभावक भी बच्चों के भविष्य को लेकर ज्यादा विरोध नहीं कर पाते।
किताबों पर कमीशन कर रहे फिक्स
एनसीईआरटी की किताबों में पुस्तक विक्रेताओं को मात्र 15 से 20 फीसदी ही कमीशन मिलता है, जबकि निजी प्रकाशकों से 40 से 60 फीसदी तक कमीशन देते हैं। इसके अलावा स्टेशनरी के ऑफर अलग मिलते हैं। पुस्तक विक्रेता से प्राप्त जानकारी के अनुसार इस मोटे कमीशन के लालच में स्कूल संचालक प्रकाशकों से सीधे डील कर सीधे स्कूलों में ही किताबें मंगा लेते हैं या फिर स्कूल द्वारा निर्धारित किए पुस्तक विक्रेताओं से अपना कमीशन प्राप्त करते हैं। प्रतिवर्ष होने वाले इस खेल में ही स्कूल संचालकों को लाखों का फायदा होता है। (संवाद)
निजी प्रकाशकों की कॉपी-किताब का मूल्य
कक्षा निजी प्रकाशकों का मूल्य एनसीईआरटी
प्री नर्सरी, नर्सरी दो से तीन हजार रुपये 200 रुपये
पहली से 5वीं चार से पांच हजार रुपये 300 रुपये
छठी से 8वीं 5 से 6 हजार रुपये 700 रुपये
9वीं से 10वीं 7 से 8 हजार रुपये 850 रुपये
11वीं से 12वीं 8 से 10 हजार रुपये 1000 रुपये
कक्षानुसार दुकानों पर स्कूल ड्रेस की कीमत
प्री प्राइमरी 500 से 700 रुपये
पहली से 5वीं कक्षा 800 से एक हजार रुपये
छठी से 8वीं कक्षा 1000 से 1500 रुपये
9वीं से 12वीं कक्षा दो हजार से ढ़ाई हजार रुपये
एक ही दुकान पर किताबें मिलना गलता
अगर किसी स्कूल की किताबें सिर्फ एक ही दुकान पर मिल रही हैं तो यह गलत है। एनसीईआरटी की पुस्तकों का मामला कोर्ट में विचाराधीन है। स्कूल एक ही दुकान से सेटिंग कर पुस्तकें लगा रहे हैं तो बहुत ज्यादा गलत है। ऐसे में जरूरी है कि सभी पुस्तकों की लिस्ट सार्वजनिक की जाए। पुस्तकें सभी दुकानों पर मिलनी चाहिए। इस संबंध में जल्द ही सभी स्कूल संचालकों की बैठकें की जाएंगी।
- रामअवतार शर्मा, प्रधान प्राइवेट स्कूल एसोसिएशन।
कार्रवाई की जाएगी
कोई भी स्कूल संचालक विद्यार्थियों को निजी प्रकाशन की किताबें नहीं पढ़ा सकता। प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए अलग से रेफरेंशन बुक लगा सकते है। अगर कोई निजी स्कूल निजी प्रकाशन की किताब पढ़ाता है तो उसके खिलाफ उचित विभागीय कार्रवाई की जाएगी।
- रामअवतार शर्मा, जिला शिक्षा अधिकारी, भिवानी।