बहल (भिवानी)। लीक से हटकर कुछ अलग करने की मन में ठान ली जाए तो निश्चित रूप से वहां से कामयाबी का रास्ता मिल जाता है। बहल कस्बे के राजेंद्र गाढ़ा की कहानी भी उन किसानों के लिए प्रेरणादायक साबित हो सकती है, जो परंपरागत खेती में बदलाव कर कुछ अलग करने की मन में चाह रखते हो। राजेन्द्र गाढ़ा ने बागवानी से जुड़कर मात्र तीन महीने में करीब छह लाख रुपये की आमदनी कर बहल जैसे रेतीले इलाके में नया कीर्तिमान स्थापित किया है।
राजेंद्र गाढ़ा ने अपनी पांच एकड़ जमीन में मई 2021 में परंपरागत खेती से हटकर एक एकड़ में नेट हाउस लगाया। काफी सोच विचार के बाद इस किसान ने पहली बार खीरे की फसल लगाई। नहरी पानी की उपलब्धता नहीं होने के बाद भी किसान का प्रयास सफल रहा और पहली बार में ही करीब छह लाख रुपये की फसल की बिक्री की। यह भी खास बात रही कि किसान की सारी फसल आसपास में ही खरीद हो गई और उसे फसल बिक्री के लिए कहीं बाहर का बाजार नहीं देखना पड़ा। खीरे की फसल में कामयाबी मिलने के बाद अब किसान राजेंद्र ने शिमला मिर्च, टमाटर व प्याज लगाने का मन बनाया है। संवाद
41 दिन में मिली फसल, तीन महीने तक की बिक्री
राजेंद्र ने बताया कि उसे नेट हाउस लगाने में काफी दिक्कत हुई वहीं उसके मन में डर था कि कहीं फसल जमीन व पानी को न माने और कहीं नुकसान न झेलना पड़ जाए। नेट हाउस पर करीब साढ़े तीन लाख रुपये और फसल बुवाई पर करीब 50 से 60 हजार रुपये लगाने के बाद एक एक दिन गिन गिन कर निकाले। पर, करीब 41 दिन बाद जब खीरा लगना शुरू हुआ तो उम्मीद बनी कि शायद लागत तो आ ही जाएगी। लगातार तीन महीने चली फसल ने उसे पहली बार में ही अच्छी आमदनी मिली और उसने करीब साढ़े छह लाख रुपये के खीरे बेचे। अब उसने फरवरी में फिर से खीरा बोने की तैयारी की है।
फाड़िया वैरायटी से मिली अच्छी पैदावार
राजेंद्र ने बताया कि उसने खीरे की फाड़िया और कटरीना वैरायटी की फसल लगाई। जब फसल बनी तो पता चला कि फाड़िया की फसल से बढ़िया आमदनी हुई है। फाड़िया वैरायटी जहां साइज में बड़ी होने के कारण वजन में ज्यादा बैठती है वहीं कटरीना साइज में छोटी है। फाड़िया वैरायटी की यह भी खासियत है कि यह जल्दी पक कर तैयार हो जाती है। फाड़िया से 41 दिन बाद ही पैदावार शुरू हो जाती है जबकि कटरीना में करीब 10 से 15 दिन तक ज्यादा लगते हैं।
आलू, गाजर की पैदावार भी रही मनमाफिक, अब प्याज की पौध है तैयार
राजेंद्र ने खीरे की फसल के बाद जब जमीन खाली हुई तो उसमें आलू और गाजर की पैदावार ली तो वो भी अच्छी रही। आलू और गाजर जहां पैदावार में सही रहे वहीं बाजार में भी सही भाव पर बिके। इसके अलावा राजेंद्र ने अब करीब डेढ़ एकड़ में प्याज की पौध लगाई है जो लगभग तैयार हो चुकी है। प्याज के अलावा अब करीब दो एकड़ जमीन को शिमला मिर्च और टमाटर की फसल के लिए तैयार की है। राजेन्द्र ने बताया कि उसे लगने लगा था कि अब परंपरागत खेती से भविष्य सुरक्षित नहीं है तो उसने यह जोखिम लिया था, पर शुक्र है कि उसे अपने मिशन में कामयाबी मिली है।
राजस्थान से सटे बहल, लोहारू क्षेत्र में किसान परंपरागत खेती तक ही सीमित थे। पर, अब किसानों की सोच में आए बदलाव व सरकार के प्रयासों से किसान फल, फूल और सब्जियां उगाने लगे है जो कि परिवर्तन का एक अच्छा संकेत है। सरकार ने बागवानी को जोखिम रहित करने के लिए कदम उठाया है तो बागवानी के लिए उत्कृष्ट केंद्र बनाने जा रही है जिससे इलाके में कृषि क्षेत्र में नई संभावनाओं का सूत्रपात होगा और किसान समृद्ध व खुशहाल होगा। - जयप्रकाश दलाल, कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री, हरियाणा।