भिवानी। द्वापर युग में भगवान श्रीकृष्ण और गोपी स्नान की परंपराओं की कथाओं के साथ गंगा स्नान के ऐतिहासिक महत्व से भी जल्द जिले के लोग जुड़ सकेंगे। धार्मिक और पर्यटन के अनूठे मेल को समेटे छोटी काशी के लठियावाला जोहड़ी धाम की झील को पर्यटन की दृष्टि से संवारे जाने की योजना है। यहां लोग कश्ती की सवारी कर सकेंगे और भिवानी की पुरानी परंपराओं और इतिहास को जान सकेंगे। करीब 63 लाख के बजट से दो माह में झील बनकर तैयार हो जाएगी। इस झील की खासबात यह भी रहेगी कि यहां अत्याधुनिकता के साथ पुरानी संस्कृति की झलक भी दिखाई देगी। योजना के तहत झील के बीच भगवान शिव की भव्य प्रतिमा भी स्थापित की जाएगी। प्रतिमा की जटाओं से गंगा की धारा प्रकट होकर सीधी झील में समाहित होगी। इसके साथ ही महिलाओं के लिए स्नान के बाद घाट के समीप ही 10 रूम भी बनाए गए हैं।
गांव पालुवास के करीब 28 एकड़ भूमि महम रोड के समीप लगती हैं। इसके अंदर बाबा जीतनाथ लठियाला का ऐतिहासिक समाधि स्थल भी बना है। इसके निकट ही सौ साल पुरानी बाबा लठियावाली प्राचीन जोहड़ी थी, जो समय के साथ इतिहास के पन्नों में दफन हो गई। जोहड़ी स्थल के आसपास भी काफी झाड़ियां उग आईं और धार्मिक स्थल का महत्व कम हो गया। ऐसे में अब भिवानी के विधायक घनश्यामदास सर्राफ ने लठियावाली जोहड़ी का जीर्णोद्धार करा पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने की योजना बनाई है। विधायक ने निजी कोष से 15 लाख रुपये का बजट धाम की झील को विकसित करने के लिए लगा दिया। अब तक करीब 53 लाख रुपये झील को विकसित किया जा चुका है। अब जल्द ही दस लाख रुपये के बजट की जरूरत है।
डेढ़ साल पहले शुरू हुआ था झील का काम
लठियावाला जोहड़ी धाम की झील का 80 फीसदी काम पूरा हो चुका है। करीब डेढ़ साल पहले शुरू हुआ काम आगामी दो साल में पूरा हो जाएगा। निर्माण कार्य का झील का अस्तित्व बन नजर आने लगा है। झील के चारों ओर की गुमटी भी बनकर तैयारी चुकी हैं। इस पर राजस्थान के कोटा का लाल पत्थर व नक्काशी भी पर्यटकों को लुभाएगी। झील व धाम में प्रवेश के लिए भव्य मुख्य द्वार भी बनाया जा रहा है। झील के आसपास की हरियाली भी लोगों को अपनी ओर आकर्षित करेगी। एक एकड़ में बनी झील में जमीन के नीचे से ही जलधारा फूट रही है।
यूं पड़ा लठियावाला जोहड़ी धाम का नाम
सेठ शिंभूराम किरोड़ीमल लुहारीवाले ने ज्येष्ठ शुक्ल की 12 तिथि संवत 1981 में यहां धाम का निर्माण कराया था। यहां सिद्ध बाबा लठियावाले थे, जो हाथ में लाठी लेकर चलते थे। सेठ ने बाबा की लाठी अर्थात डोगा पर चांदी मढ़ा दी थी। बाबा हरिद्वार गए तो उन्होंने लाठी गंगा में फेंक दी। इसे देख सेठ भी अचंभित रह गए। जब वह भिवानी पहुंचे तो जोहड़ी के अंदर ही लाठी मिली। इसके बाद यहां लठियावाली जोहड़ी का नाम पड़ा। इसी प्रकार कई अन्य दंतकथाएं भी प्रचलित हुईं। तभी से यहां 23 अक्तूबर को वार्षिक मेले का आयोजित किया जाने लगा। मेले में दूरदराज से महिलाएं पहुंचकर स्नान कर पूजा अर्चना करती हैं। यहां कदंब का भी पुराना पेड़ था, जो अब विलुप्त हो गया। ऐसे में यहां कदंब के नए पेड़ लगाए जा रहे हैं।उनके बाद यहां बाबा बालकनाथ और फिलहाल जीतनाथ लठियावाला मंदिर में महंत बिजेंद्र नाथ गद्दी पर विराजमान हैं।
लठियावाला प्राचीन जोहड़ी मंदिर धार्मिक नगरी छोटी काशी का ऐतिहासिक और प्राचीनतम धरोहर है। इस पर एक एकड़ में झील बनकर तैयार हो चुकी है। मैंने खुद 15 लाख रुपये खर्च किए हैं और समाज के लोगों के सहयोग से 20 लाख रुपये का बजट और लग चुका है। 18 लाख रुपये का बजट मंत्रियों के कोटे से लगा है। वर्तमान में दस लाख रुपये के बजट की आवश्यकता हैं। इसकी व्यवस्था कराई जा रही है।
- घनश्यामदास सर्राफ, भाजपा विधायक भिवानी
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