भिवानी। कोरोना वायरस से जंग में अहम भूमिका निभा रहे रहे चिकित्सकों के स्वास्थ्य से करीब एक माह से खिलवाड़ किया जा रहा है। सुरक्षा की दृष्टि से चिकित्सकों को घर से दूर रखा गया है। मगर जहां वे ठहरे हैं, वहां जो खाने की व्यवस्था की गई है, उस पर चिकित्सकों ने सवाल उठाए हैं। चिकित्सकों का कहना है कि शरीर को हानि पहुंचाने वाली फटी पॉलिथीन में खाना आ रहा है, जिसमें चींटियां तक लगी होती हैं। खाना आने का समय भी निर्धारित नहीं है। कई बार तो चिकित्सक ड्यूटी पर जा चुके होते हैं, उसके बाद खाना आता है। सूत्रों के माध्यम से यह वीडियो अमर उजाला तक पहुंचा है।
सामान्य अस्पताल के करीब 40 चिकित्सक, स्टाफ नर्स, लैब टेक्निशियन, फार्मासिस्ट क्वारंटीन सेंटर लोहारू के आइसोलेशन वार्ड और फ्लू कॉर्नर में ड्यूटी दे रहे हैं। चिकित्सकों की मांग पर उनके परिजनों की सुरक्षा की दृष्टि से सभी के लिए रहने की व्यवस्था रेस्ट हाउस और पंचायत भवन में की गई है। पंचायती राज कार्यालय परिसर में बनाई गई किचन से उनके लिए खाना आ रहा है। इस खाने की गुणवत्ता पर डॉक्टरों ने सवाल उठाए हैं।
शनिवार को दोपहर के समय ड्यूटी से रेस्ट हाउस पहुंचे चिकित्सक ने वहां उनके लिए आए खाने पर सवाल उठाए। खाना जिस पॉलिथीन में आया था, वह तीन जगह से फटा हुआ था और चींटियां लगी हुई थीं। चिकित्सकों का कहना है कि कोरोना से जंग तो ठीक, लेकिन यहां तो व्यवस्थाओं से भी जंग करनी पड़ रही है।
...ऐसे में टूट रही सामुदायिक दूरी
चिकित्सकों ने बताया कि बेशक सभी चिकित्सकों और स्टाफ सदस्यों को क्वारंटीन सेंटर में एक-दूसरे के संपर्क में नहीं आने की हिदायत है। मगर दो-दो, तीन-तीन बंदों का खाना एक ही पॉलिथीन में आता है तो सभी संपर्क में भी आते हैं। एक पॉलिथीन में 15-20 रोटी और दो पैकेट सब्जी के मिलते हैं। ये ही खाना सभी को खाना होता है। भोजन पैकिंग करने वाले अगर पहले ही सबके लिए अलग-अलग पैकेट तैयार कर दे तो उनका रिस्क भी कम होगा।
नहीं जा सकते घर
कोविड-19 में ड्यूटी होने के कारण चिकित्सक अपने परिजनों के संपर्क में नहीं आना चाहते। इसी कारण चिकित्सकों व अन्य स्टाफ सदस्यों की रेस्ट हाउस और पंचायत घर में रहने की व्यवस्था की गई है।
खाना आने का समय भी नहीं है तय
रेस्ट हाउस में ठहरे चिकित्सकों के लिए सुबह का नाश्ता, दोपहर और शाम का खाना आता है मगर खाना आने का समय तय नहीं होने के कारण अक्सर चिकित्सकों को परेशानी उठानी पड़ती है। सुबह नाश्ता सवा आठ से साढ़े आठ के बीच आता है जबकि चिकित्सक की ड्यूटी सुबह आठ बजे शुरू होती है। ऐसे में चिकित्सक बिस्कुट खाकर ही ड्यूटी पर जाने को मजबूर हैं। दोपहर का खाना भी डेढ़ से दो बजे की बीच आता है जबकि चिकित्सकों को दो बजे तक अस्पताल पहुंचना होता है। ऐसे में या तो जल्दबाजी में खाना खाकर निकल रहे हैं या फिर बिना खाना खाए। यही स्थिति रात्रि खाने की है।
यह हो सकती है व्यवस्था
जिला प्रशासन या विभाग चाहे तो कोरोना योद्धाओं के लिए रेस्ट हाउस की रसोई में ही अच्छे खाने की व्यवस्था हो सकती है। यहां कुक और सामान की व्यवस्था करनी होगी। खाना बनाने की कार्य में स्वयं सहायता समूह के तहत रसोई चलाने वाली महिलाओं की भी मदद ली जा सकती है।
उच्च अधिकारियों को कई बार बताई है समस्या
रेस्ट हाउस में रहने वाले चिकित्सकों का कहना है कि उन्होंने कई बार संबंधित अधिकारियों को खाने की समस्या के बारे मेें बताया है। एक महीने से ज्यादा समय हो गया, मगर अभी तक उनके लिए ठीक से खाने की व्यवस्था नहीं हुई है। उनकी मांग शाही भोजन की नहीं की है, उन्हें सिर्फ ठीक से पैक, स्वच्छ और सुरक्षित भोजन मिले वही काफी है।
पंचायत ट्रेनिंग सेंटर में चिकित्सकों के लिए खाना बन रहा है, मगर यह उनके अपने स्तर पर है। खाने की क्वालिटी के बारे में मैं कुछ नहीं बता सकता। - प्रमोद चहल, डीआरओ
रेस्ट हाउस में ठहरे चिकित्सकों के लिए खाने की व्यवस्था जिला प्रशासन की ओर से की गई है। कैसे खाना है या कहां से आ रहा है इस बारे में कुछ नहीं बता सकता। - डॉ. जितेंद्र कादयान, सिविल सर्जन