भिवानी। लॉकडाउन में जिला प्रशासन और सरकार के भरोसे घर जाने की आस में बैठे प्रवासी मजदूरों का सब्र का बांध अब टूटने लगा है। जिला प्रशासन की तरफ से शहर के गुजरानी मोड़ आश्रम में ठहराए गए करीब 500 प्रवासी मजदूर शनिवार को भरी दोपहर में अपने छोटे छोटे बच्चों और महिलाओं के साथ पैदल ही पलायन करने को मजबूर हो गए। उन्हें चार दिन पहले रोहतक से पटना जाना था। मगर ट्रेन में सीटें फुल होने के बाद उन्हें वापस आश्रम में छोड़ दिया गया था। मजदूरों का आरोप है कि उसके बाद न प्रशासन कोई सुध ले रहा है और न ही कोई जाने की व्यवस्था कर रहा है।
विपुल कुमार, कमलेश राय, कमलकांत, विष्णुदत्त समेत अन्य मजदूरों ने कहा कि चार दिन पहले पटना भेजने के लिए बस से रोहतक लेकर गए थे। वहां ट्रेन में जगह नहीं थी तो वापस आश्रम ले आए। अब चार दिन से कोई सुध नहीं ले रहा, अब तो भूखे रहेंगे, प्यासे रहेंगे, मर जाएंगे, लेकिन घर जाएंगे...। उनका कहना था साहब...पटना ले जाने के लिए भिवानी से 13 मई को बस से रोहतक ले गए, रोहतक से स्पेशल ट्रेन में जगह नहीं मिली तो उन्हें बस से वापस फिर यहीं लाकर आश्रम में छोड़ दिया। चार दिनों से यहां पड़े हैं, एसडीएम के खिलाफ धरना दिया, मगर चार दिन से कोई सुध लेने वाला नहीं है। प्रशासन द्वारा उन्हें घर भिजवाने की कोई व्यवस्था न होने की वजह से खुद ही आश्रम छोड़कर पैदल पलायन शुरू कर दिया। गर्मी में छोटे बच्चों व सामान को लेकर अपनी बेबसी को थामें ये मजदूर पैदल ही सफर पर निकल पड़े। वहीं यह भी कहना है कि सरकार केवल खेतीहर मजदूरों को घर भिजवाने की व्यवस्था कर रही हैं, लेकिन जिन प्रवासी मजदूरों का प्रशासन और सरकार कोई इंतजाम नहीं कर पा रही है, वे पैदल ही पलायन को मजबूर हो गए हैं।
मजदूरों के रजिस्ट्रेशन करवाने में भी छूट रहे पसीने
भिवानी। प्रवासी मजदूरों के लिए घर जाने के लिए ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन कराना भी मुसीबत से कम नहीं है। पुलिस प्रवक्ता अभिषेक के अनुसार प्रवासी मजदूर ईदिशा.जीओवी.ईएन पर रजिस्ट्रेशन कराकर इंतजार करें। मजदूर अपना व अपने परिवार का सामान्य अस्पताल से मेडिकल परीक्षण करवाकर अपने संपूर्ण दस्तावेज साइट पर अपलोड करवाएं। उनके रजिस्टर्ड मोबाइल पर मैसेज आएगा। इसके बाद उन्हें भेजा जाएगा। अब मजबूरी ये है कि अधिकांश प्रवासियों के पास तो फोन तक नहीं है और हैं तो सामान्य मोबाइल हैं। वहीं काफी संख्या प्रवासी मजदूर पढ़े लिखे नहीं हैं या बहुत कम पढ़ें हैं, जिन्हें जानकारी नहीं मिल रही है। इसी तरह कॉमन सर्विस सेंटर पर रजिस्ट्रेशन के लिए भी उन्हें नकद भुगतान करना पड़ता है जबकि पैसे के अभाव में मजदूर रजिस्ट्रेशन भी नहीं करा पाते हैं।
पैदल पलायन मानवता का दुर्भाग्य है। मजदूरों के परिवार में छोटे बच्चे और महिलाएं भी हैं। सड़क पर बचपन रो रहा है, जिनके पास न खाने को कुछ है न घर और न रोजगार है। ऐसे में सड़क पर आए बच्चों और महिलाओं के साथ साथ मजदूरों की सुरक्षा व अधिकारों का भी हनन हो रहा है। सरकार ऐसे लोगों का पलायन रोकने के लिए उन्हें इस बात का अहसास कराए कि वे रोजगार के साथ-साथ उनके पुनर्वास का इंतजाम करेगी या फिर उन्हें सुरक्षित तरीके से घर तक पहुंचाएगी। फिलहाल मजदूर तबका खुद को असुरक्षित और असहाय समझ रहा हैं, यही उनकी पलायन की वजह बन गया है। - एडवोकेट मीना जांगड़ा, पूर्व सदस्या जिला बाल कल्याण समिति।
प्रवासी मजदूरों को घर भेजने की व्यवस्था मुख्यालय और रेलवे मिलकर जिला प्रशासन के माध्यम करता है। इस प्रक्रिया में अधिकांश प्रवासी मजदूर घर भेजे जा चुके हैं। प्राथमिकता खेतीहर मजदूरों को घर भेजे जाने की है। अगर कोई मजदूर किराये के मकानों में लौटना चाहता है तो उनकी मर्जी, प्रशासन किसी को जबरदस्ती रोककर नहीं रख सकता। उनकी घर भेजने व्यवस्था कर सकता है। - महेश कुमार, एसडीएम भिवानी।
औद्योगिक सेक्टरों से 15 हजार औद्योगिक मजदूर कर चुके पलायन, पांच हजार जाने की आस में
भिवानी। औद्योगिक इकाइयों के संचालन की व्यवस्था न बनने, कच्चे और तैयार माल की कमी के साथ औद्योगिक क्षेत्रों में काम करने वाले मजदूरों के पलायन से भी उद्योगों की चिंता बढ़ गई है। अहम बात यह है कि भिवानी जिले में करीब डेढ़ हजार कारोबारी और उद्योगों को संचालन की ऑनलाइन अनुमति सरकार से मिल चुकी है। फिर भी अधिकांश बड़े व मध्यम दर्जे के उद्योगों की चिमनियों से धुआं नहीं उठ रहा है। क्रशर जोन व कुछ इंडस्ट्रीज को छोड़कर भिवानी के उद्योगों में हर माह होने वाला करीब 500 करोड़ का कारोबार पूरी तरह से ठप है।
भिवानी के औद्योगिक सेक्टर 21 और 26 में करीब साढ़े तीन सौ से अधिक फैक्ट्रियों को एनआईसी के माध्यम से जिला उद्योग संघ व जिला प्रशासन ने ऑनलाइन ही संचालन की अनुमति प्रदान कर दी है। भिवानी औद्योगिक सेक्टरों में करीब 20 हजार इंडस्ट्रीज कारीगर लॉकडाउन से पहले काम कर रहे थे। लॉकडाउन से कुछ पहले कुछ कारीगर त्योहार पर अपने गांव गए थे। लॉकडाउन लगा तो करीब 15 हजार इंडस्ट्रीज मजदूर पलायन कर गए। अब करीब पांच हजार मजदूर बचे हैं, लेकिन वे भी अपने घर जाने की आस में हैं। उद्योगों की हालत मजदूरों की वजह से ही खराब नहीं हैं, बल्कि उन्हें कच्चा माल भी उपलब्ध नहीं हो रहा है। वहीं संचालन में कोई भी व्यवस्था नहीं बन पा रही है।
सरकार ने औद्योगिक इकाइयों के संचालन की अनुमति दे दी है और राहत पैकेज की घोषणा भी हो गई है। लेकिन इंडस्ट्रीज में कारीगर और संसाधन नहीं है। इस वजह से सबकुछ बंद पड़ा है। औद्योगिक क्षेत्र से करीब 15 हजार कारीगर पलायन कर चुके हैं। वहीं पांच हजार कारीगर घर जाने की आस में हैं। मौका मिलते ही ये भी घर चले जाएंगे तो उद्योगों को चलाएगा कौन। बाहर से कुछ कारीगर आना भी चाहते हैं, लेकिन उनके पुनर्वास की सरकार गारंटी ले। - धर्मबीर नेहरा, प्रधान इंडस्ट्रीज एसोसिएशन भिवानी।
शहर के सरकुलर मार्ग पर प्रवासी मजदूर परिवार पैदल पलायन करते हुए। - फोटो : Bhiwani