- शुद्ध पेयजल की किल्लत ने बढ़ाया बोतलबंद पानी का कारोबार, 30 प्लांटों से 80 हजार लीटर पानी हर दिन निकल रहा
संवाद न्यूज एजेंसी
अंबाला। जर्जर पाइपलाइनों से मटमैला और बदबूदार पानी की आपूर्ति हो रही है, इस कारण छावनी की एक चौथाई आबादी बोतलबंद पानी पर निर्भर होने लगी है। बीमार पड़ने के डर से जिन लोगों के घर पर आरओ नहीं है वह पानी की बोतल खरीदने को मजबूर हैं। इसी डर ने पेयजल कारोबारियों का धंधा चमका दिया है। जब-जब पानी के खराब होने की खबरें सुर्खियां बटोरती हैं तब-तब बोतलों की मांग में उछाल आ जाता है। साथ ही नल आदि की सुविधा नहीं है जिससे लोग पानी भर सकें।
अंबाला छावनी व सिटी के अलग-अलग क्षेत्रों में 30 के करीब प्लांट लगे हुए हैं। इन प्लांटों से रोजाना 80 हजार लीटर पानी की बिक्री हो रही है। इसी आंकड़े को एक प्लांट की खपत के अनुसार देखें तो एक प्लांट से रोजाना 150 पानी के कैंपर बाजार और रिहायशी क्षेत्रों में सप्लाई होते हैं। इसके लिए लोगों को 60 से 70 रुपये प्रति कैंपर लिए जाते हैं। हैरानी की बात है कि कैंपर के यह रेट लगातार बढ़ते जा रहे हैं। पानी का प्लांट चलाने के लिए किसी भी कारोबारी को जनस्वास्थ्य व स्वास्थ्य विभाग के पास ऑनलाइन आवेदन करना होता है। इसके बाद दोनों विभागों की टीमें प्लांट का निरीक्षण करती हैं और स्वीकृति दे देती हैं। विभागीय अधिकारियों का दावा है कि अंबाला में अवैध रूप से एक भी प्लांट संचालित नहीं है।
नहीं होती जांच
प्लांट से जुड़े कारोबारियों का कहना है कि उन्होंने सरकार के नियमों के तहत स्वच्छ पानी के प्लांट खोले हुए हैं और पानी की सप्लाई से पहले रोजाना टीडीएस भी चैक किया जाता है जोकि 100 के करीब रहता है। हालांकि गली-मोहल्लों में खुले पानी के इन प्लांटों की देख-रेख को लेकर विभागीय अधिकारी सतर्क नहीं हैं। जब पेट दर्द, उल्टी और दस्त के मामले नागरिक अस्पताल में बढ़ने लगते हैं तो फिर स्वास्थ्य और जनस्वास्थ्य विभाग की टीम मिलकर काम करती है और संबंधित क्षेत्र में जाकर सैंपल लेती है। यह कार्यवाही कभी-कभार ही होती है जबकि ऐसे मामलों में विभाग को औचक निरीक्षण करना चाहिए और जब पानी की सप्लाई दी जाए तो बीच बाजार ही पानी के सैंपल भी लिए जाएं ताकि पानी की शुद्धता की सही तरीके से जांच हो सके।
बाढ़ जैसे हालात बनने पर बढ़ा कारोबार
पानी के कैंपरों पर प्रतिदिन बढ़ती निर्भरता को इस प्रकार समझा जा सकता है कि पिछले बारिश के सीजन में जब नदियां उफान पर थीं तो ट्यूबवेल से कई इलाकों में गंदा पानी सप्लाई होने लगा। लोग बीमार पड़ने लगे तो जनस्वास्थ्य विभाग ने हाथ खड़े कर दिए और लोग प्राइवेट दुकानों से पानी के कैंपर खरीदते दिखे। उन दिनों में एक-एक कैंपस 150 रुपये के दाम में बिका। एक सप्ताह तक लोगों को ऐसे ही हालातों से गुजरना पड़ा और अपनी जेब ढीली करनी पड़ी।
जार के पानी की नहीं गारंटी
गंदे पानी की समस्या से निपटने के लिए पिछले छह माह से पानी वाले जार का इस्तेमाल कर रहे हैं। जार में भरा पानी फिल्टर है या सीधे बोरवेल का, इसकी कोई गारंटी नहीं है। लेकिन सरकारी के मुकाबले यह पानी साफ व स्वच्छ नजर आता है।
- साहिब सिंह
गर्मी में बढ़ जाती है दिक्कत
नगर परिषद के नल से जो पानी आता है, उसमें अक्सर गंदगी व मटमैला पन रहता है। गर्मी में यह दिक्कत बढ़ जाती है। बच्चों को बीमार होने से बचाने के लिए मजबूरी में बोतल बंद पानी मंगवाना पड़ता है।
- अजय गुलाटी
कर्मचारी धरातल पर नहीं करते काम
विभाग अपने काम में लापरवाही बरत रहे हैं जबकि उनकी आंखों के नीचे छावनी में लगातार पानी के प्लांट खुलते जा रहे हैं और इसकी जानकारी विभाग के पास नहीं है क्योंकि विभाग के कर्मचारी कभी धरातल पर उतरकर काम ही नहीं करते।
- मोनू जग्गी
गर्मी में बढ़ जाती है समस्या
गर्मी के दौरान गंदे पानी की समस्या गंभीर होती है, लेकिन इस समस्या का स्थाई समाधान आजतक नहीं हो पाया। इसलिए जब भी जरूरत होती है तो बोतल बंद पानी या जार बाजार से खरीद कर इस्तेमाल करते हैं।
- सत्यपाल यादव
ऐसा नहीं है कि स्वास्थ्य विभाग के साथ मिलकर समय-समय पर पानी के प्लांटों का दौरा किया जाता है। प्लांट संचालकों को रजिस्टर मेनटेन करने की हिदायत दी गई है। पानी में टीडीएस की मात्रा जांचने के लिए विशेष टीम समय-समय पर औचक निरीक्षण करती है।
- बलिंदर, एसडीओ, जनस्वास्थ्य विभाग, अंबाला
साहिब सिंह।- फोटो : गश्त करते पुलिस व एसएसबी के जवान।
साहिब सिंह।- फोटो : गश्त करते पुलिस व एसएसबी के जवान।
साहिब सिंह।- फोटो : गश्त करते पुलिस व एसएसबी के जवान।