पंडित शरद चंद्र मिश्र ने बताया कि मान्यता के अनुसार स्वर्गलोक के अलकापुरी नगर के कुबेर नामक राजा भोलेनाथ का बड़ा भक्त था। चाहे जो परिस्थिति हो भगवान की पूजा निश्चित करता था। वहीं हेम नामक माली प्रतिदिन पूजा के लिए फूल देता था। एक दिन फूल तोड़कर ले आया लेकिन पूजा में समय है, यह सोचकर पत्नी के साथ रमण करने लगा।
इधर, जब पूजा बीतने के बाद भी माली फूल लेकर नहीं पहुंचा तो कुबेर राजा को क्रोध आया और उन्होंने पत्नी वियोग का उसे श्राप दे दिया। साथ ही, कोढ़ ग्रस्त होकर धरती पर विचरण करने का भी श्राप दे दिया। इधर, धरती पर आने के बाद कोढ़ और भूख-प्यास की पीड़ा के बावजूद वो नियमित रूप से भगवान की शिव की आराधना में जुटा रहा।
एक दिन घूमते-घूमते महर्षि मार्कंडेय के आश्रम में पहुंच गया। महर्षि को उसकी स्थिति पर बड़ी दया आई और उन्होंने माली को योगिनी एकादशी करने को कहा। महर्षि के बताए अनुसार योगिनी एकादशी व्रत करने से माली को शाप से मुक्ति मिल गई और वह सुखपूर्वक जीवन जीने लगा।