दीपेंद्र मोहन सिंह, डॉ. मीनाक्षी गुप्ता, प्रो. अनुभूति दुबे व मो. फहद अली।
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कन्या विवाह की न्यूनतम आयु 18 से बढ़ा कर 21 वर्ष करने का कैबिनेट का फैसला महिला सशक्तीकरण, शिक्षित और स्वस्थ समाज निर्माण में मील का पत्थर साबित होगा। लैंगिक समानता के इस युग में विवाह की आयु बढ़ाने से लड़कियों को अपना कॅरियर संवारने के लिए अधिक समय मिलेगा। शारीरिक-मानसिक विकास बेहतर ढंग से होने के कारण कन्या, परिवार-ससुराल और समाज से भी परिपक्व ढंग से समन्वय स्थापित कर सकेगी। कैबिनेट के इस फैसले का समाज में स्वागत हो रहा है।
गोरखपुर विश्वविद्यालय के समाजशास्त्र विभाग के सहायक आचार्य दीपेंद्र मोहन सिंह ने बताया कि केंद्रीय कैबिनेट का यह फैसला लैंगिक समानता तथा महिला सशक्तीकरण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। महिला-पुरुष के विवाह के उम्र में अंतर रखना रूढ़िवाद को दर्शाता है, इसका कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है। लड़कियों के विवाह की उम्र बढ़ने से उनके पास शिक्षा के अवसर ज्यादा होंगे तथा अपने जीवन में सही ढंग से फैसले लेने में सक्षम हो पाएंगी। साथ ही रोजगार के अवसर भी तलाश पाएंगी। विवाह व्यक्ति के सामाजिक-सांस्कृतिक पहलू का हिस्सा होता है। लोगों की मानसिकता में परिवर्तन के बाद ही जमीनी स्तर पर प्रभावी बदलाव लाया जा सकता है। इसके लिए सरकारी प्रयास के साथ अभिभावक और छात्र-छात्राओं को भी जागरूक किया जाना चाहिए।
स्त्री एवं प्रसूति रोग विशेषज्ञ डॉ. मीनाक्षी गुप्ता ने बताया कि 18 वर्ष की उम्र तक लड़कियों का शारीरिक, मानसिक विकास पूर्ण नहीं होता है। इस उम्र में उनकी हड्डियां, मसल्स, मांस आदि ग्रोथ कर रही होती हैं। इस उम्र में पूर्ण मानसिक परिपक्वता भी नहीं होती है। ऐसे में इस उम्र में शादी सर्वाइकल कैंसर, रक्ताल्पता, मानसिक बीमारियां आदि का कारण बनती है। चिकित्सकीय रूप से गर्भधारण की आदर्श आयु 21 वर्ष या उससे अधिक है। इस उम्र में लड़की का शारीरिक और मानसिक विकास पूर्ण हो जाता है। निश्चित ही इस फैसले के लागू होने से लड़कियों में कम आयु में विवाह करने से पैदा होने वाली समस्याओं पर अंकुश लगेगा।
गोरखपुर विश्वविद्यालय के मनोविज्ञान विभाग की अध्यक्ष प्रो. अनुभूति दुबे ने बताया कि बाल विवाह प्रतिबंधित है, बावजूद इसके अभिभावकों पर सामाजिक दबाव रहता है कि लड़की की आयु 18 वर्ष पूर्ण होते ही विवाह कर दिया जाए। इस फैसले से अभिभावकों पर यह दबाव नहीं रहेगा। समाज में जिस तरह से बदलाव आए हैं, लड़कियां पढ़ रही हैं, बाहर निकल रही हैं, कॅरियर बना रही हैं। इस फैसले से उन्हें मनोवैज्ञानिक संबल प्राप्त होगा। उनमें आत्मविश्वास बढ़ेगा कि कॅरियर बनाने के दौरान शादी का दबाव नहीं पड़ेगा। ग्रामीण इलाकों में शिक्षा देर से शुरू होती है। ऐसे में ग्रेजुएशन तक पहुचंने में 18 वर्ष उम्र हो जाती है। शादी के बाद पढ़ाई के लिए ससुराल वालों की इच्छा पर निर्भर होना पड़ता था। अच्छा फैसला है, इससे लड़कियों को सामाजिक-आर्थिक, शैक्षिक आजादी मिलेगी।
पारिवारिक मामले के अधिवक्ता मो. फहद अली ने बताया कि कैबिनेट का फैसला बेहतर समाज निर्माण में महत्वपूर्ण साबित होगा। पारिवारिक वाद के काउंसलिंग में अधिकतर इस तरह के मामले आते हैं जिनमें लड़की ससुराल वालों के साथ समन्वय नहीं स्थापित कर पाती और घर टूटने के कगार पर आ जाता है। इस तरह के अधिकतर मामलों का कारण कम उम्र यानी 18-19 में लड़की की शादी करना होता है। दरअसल टीन एज की लड़कियां मानसिक रूप से परिपक्व नहीं होतीं। 21 वर्ष की लड़कियां अधिक परिपक्व होती हैं ऐसे में परिवार टूटने की घटनाएं भी कम होंगी। 21 वर्ष आयु होने से मातृ मृत्यु दर भी कम होगा।