केस-1
बांसगांव इलाके के बाबूराम शुक्ला को एक सप्ताह पहले लकवा मार गया। घरवाले बीआरडी मेडिकल कॉलेज लेकर पहुंचे तो पहले आईसीयू की जरूरत बताई, फिर हालत में सुधार की बात कहते हुए वार्ड में भर्ती कर लिया। इसके बाद अगले ही दिन यह कहते हुए डिस्चार्ज कर दिया गया कि इनकी हालत में सुधार आने में महीने भर का वक्त लगेगा, इसलिए बेड को बिजी रखने का कोई फायदा नहीं। घरवालों ने वार्ड में मौजूद डॉक्टर से लेकर प्राचार्य तक को अपनी समस्या बताई, लेकिन किसी ने नहीं सुनी।
केस-2
बिहार निवासी जितेंद्र यादव सड़क हादसे में गंभीर रूप से घायल हो गए। इमरजेंसी एंड ट्रामा सेंटर में डॉक्टर ने तत्काल आईसीयू की जरूरत बताई, लेकिन बेड ही खाली नहीं था। बताया गया कि 10 ही बेड हैं, जबकि 17 मरीज पहले से ही वेटिंग में हैं। अंबु बैग लगाकर ऑक्सीजन देने का प्रयास किया गया, लेकिन हालत बिगड़ती देख परिजन निजी अस्पताल ले गए।
एक साल से कागज में बढ़ा रहे सुविधाएं
केंद्र सरकार के आयुष्मान भारत हेल्थ इंफ्रास्ट्रक्चर मिशन के तहत बीआरडी परिसर में 100 बेड का क्रिटिकल केयर यूनिट बनाया जाना है। इस यूनिट के निर्माण व उपकरणों की खरीद पर लगभग 44 करोड़ रुपये खर्च किए जाएंगे, लेकिन करीब एक साल से यह परियोजना फाइलों में ही लटकी है। पहले यह कहा गया कि खाली पड़े बाल रोग विभाग में 100 बेड का क्रिटिकल केयर यूनिट बनाई जाएगी। इस यूनिट में इंटेंसिव केयर यूनिट (आइसीयू) के 40 बेड होंगे। साथ ही 30 बेड का हाई डिपेंडेंसी यूनिट (एचडीयू) भी होगी।
20 बेड का नान वेंटिलेटर आइसीयू व 10 बेड का इमरजेंसी वार्ड होगा। दो माड्यूलर आपरेशन थियेटर भी होंगे। लेकिन, बात आगे नहीं बढ़ी। इसके बाद यह कहा गया कि 10 एकड़ जमीन मिले, तब इसका निर्माण कराया जाएगा। लेकिन वास्तविकता यह है कि मरीज आईसीयू के लिए तड़प रहे हैं और फाइलों का मामला आगे ही नहीं बढ़ रहा।
बीआरडी मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य डॉ. गणेश कुमार ने कहा कि क्रिटिकल केयर यूनिट के लिए काफी प्रयास किया गया। जमीन नहीं मिलने पर इसे परिसर में खाली अन्य भवनों में स्थापित करने पर भी विचार किया गया, लेकिन इसके लिए स्वीकृति नहीं मिल पाई। जिला प्रशासन से जमीन मांगी गई है। मेडिकल कॉलेज के नजदीक जमीन मिलने पर ही इसका निर्माण हो पाएगा।