गोरखपुर। दिग्विजयनाथ स्नातकोत्तर महाविद्यालय के राजनीति विज्ञान विभाग में ‘प्राचीन भारत में लोकतंत्र’ विषय पर शुक्रवार को व्याख्यान हुआ। मुख्य वक्ता बाबासाहेब भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय, लखनऊ के राजनीति विज्ञान विभाग के वरिष्ठ आचार्य प्रो. रिपुसूदन सिंह ने कहा कि लोकतांत्रिक विचार और संस्थाओं की जड़ें केवल आधुनिक काल में नहीं बल्कि प्राचीन भारतीय परंपरा में भी रही हैं। सभा, समिति, गण और संघ जैसी संस्थाओं में परामर्श और जनभागीदारी के तत्व दिखाई देते हैं।
उन्होंने कहा कि भारत को लोकतंत्र की जननी के रूप में समझने के लिए केवल चुनाव प्रक्रिया देखना पर्याप्त नहीं है। स्वतंत्र विचार, असहमति का सम्मान, संवाद, सहिष्णुता और जनसहभागिता लोकतंत्र के मूल आधार हैं। प्राचीन भारत के 16 महाजनपदों और गणराज्यों का उल्लेख करते हुए उन्होंने भारतीय लोकतांत्रिक परंपरा की विविधता पर प्रकाश डाला।
अध्यक्षता करते हुए प्राचार्य प्रो. ओम प्रकाश सिंह ने कहा कि भारतीय लोकतांत्रिक चेतना राजनीतिक संस्थाओं तक सीमित नहीं रही। संवाद, सहिष्णुता, परस्पर सम्मान और लोक कल्याण भारतीय जीवन-पद्धति के महत्वपूर्ण आधार रहे हैं। संचालन डॉ. प्रियंका सिंह ने किया। संयोजक डॉ. विवेक शाही ने आभार जताया। अतिथि परिचय डॉ. इंद्रेश कुमार ने कराया। इस दौरान डॉ. आरपी यादव, डॉ. शैलेश कुमार सिंह, डॉ. शुभ्रांशु शेखर सिंह, डॉ. अखिल श्रीवास्तव, डॉ. सुनील सिंह, श्वेता सिंह समेत शिक्षक और विद्यार्थी मौजूद रहे।