गोरखपुर। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) के प्रसूति एवं स्त्री रोग विभाग ने पहली बार गर्भ में पल रहे शिशु को गर्भ के भीतर ही रक्त चढ़ाकर उसकी जान बचाने में सफलता हासिल की है। इंट्रायूटेराइन ट्रांसफ्यूजन (खून की कमी वाले भ्रूण को मां के गर्भ में रहते हुए ही सीधे रक्त चढ़ाया जाना) की विधि से इसे पूरा किया। इसके बाद मां और गर्भस्थ शिशु दोनों स्वस्थ हैं।
कुशीनगर जनपद की रहने वाली यह महिला चौथी बार गर्भवती थीं। पिछले तीन बार गर्भावस्था के दौरान आरएच आइसोइम्यूनाइजेशन (जब गर्भ में आरएच-निगेटिव मां के गर्भ में आरएच-पॉजिटिव शिुशु) की गर्भस्थ शिशुओं की मौत हो गई थी। चौथी बार भी गर्भधारण उनके परिवार के लिए उम्मीद के साथ गहरी चिंता लेकर आया था। इसी बीच महिला ने एंटीनैटल ओपीडी (गर्भधारण से प्रसव तक मां और गर्भ का स्वास्थ्य परीक्षण) में परामर्श लिया।
विशेषज्ञों ने विस्तृत जांच की। जांच में डायरेक्ट कूम्ब्स टेस्ट (रक्त परीक्षण, जिसमें खून में तैरने वाली एंटीबॉडीज जांची जाए) पॉजिटिव पाया गया और नियमित डॉप्लर अल्ट्रासाउंड निगरानी शुरू की गई। कुछ समय बाद जांच में यह स्पष्ट हुआ कि इस बार भी गर्भस्थ शिशु में गंभीर एनीमिया विकसित हो चुका है। शिशु के रक्त कण लगातार नष्ट हो रहे थे, जिससे हृदय विफलता और गर्भ में मृत्यु का खतरा उत्पन्न हो गया था। जैसे किसी गंभीर एनीमिया से पीड़ित व्यक्ति को नस के माध्यम से रक्त चढ़ाकर जीवन बचाया जाता है, वैसे ही गर्भ के भीतर पल रहे शिशु की नाल तक विशेष तकनीक की सहायता से पहुंचकर रक्त चढ़ाया गया।
एम्स की डॉ. प्रीती बाला सिंह ने उपचार की इस पूरी प्रक्रिया को किया। प्रक्रिया सफल रही और गर्भस्थ शिशु, जो गंभीर एनीमिया और संभावित हृदय विफलता के कारण गर्भ में जीवन खो सकता था, अब सुरक्षित है।
ऐसी बीमारियों के लिए जाना पड़ता था लखनऊ
एम्स की कार्यकारी निदेशक डॉ. विभा दत्ता ने बताया कि अब तक ऐसी अत्याधुनिक सुविधा के लिए मरीजों को गोरखपुर में कोई उपचार नहीं मिलता है। ऐसे में गंभीर मरीजों को बड़े स्वास्थ्य केंद्र लखनऊ ही जाना पड़ता था। पूरी टीम को उन्होंने बधाई दी। कहा, एम्स ऐसे ही आगे भी चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में भी जटिल से जटिल बीमारी के सफल उपचार के लिए संकल्पित है।