संपूर्ण विश्व में सत्य अहिंसा और सद्भाव का संदेश देने वाले भगवान गौतम बुद्ध के मां की जन्मस्थली उनका ननिहाल देवदह अपनी ऐतिहासिक महत्वों को सहेजने के बाद भी पहचान की दरकार ढूंढ रहा है। देवदह की पहचान को विकसित करने का खांका तो बना लेकिन वह अबतक आकार नहीं ले पाया हैं।
बुद्धकालिन इतिहास में अपनी मजबूत पहचान रखने वाले महराजगंज जनपद के देवदह व रामग्राम को लेकर तमाम इतिहासकार एकमत हैं कि यह सभी स्थल भगवान बुद्ध से जुडीं हैं।
नौतनवां तहसील के बनरसिया कला और बनरसिया खुर्द में गांव में 1978 में पुरातत्व विभाग ने यहां 88.8 एकड़ भूमि संरक्षित कर किसी भी प्रकार के निर्माण और खनन पर रोक लगा दी। लेकिन बाद के समय संरक्षित भूमि में 20 किसानों के नाम पट्टा और चक नंबर जारी कर दिया गया। ऐसे में अब टिले के नाम मात्र 1.04 एकड़ जमीन बची है। इतिहासकार बतातें हैं कि देवदह गौतम बुद्ध की मां महामाया, मौसी महाप्रजापति गौतमी और पत्नी यशोधरा की जन्मस्थली है।
चीनी यात्री ह्वेनसांग भी देवदह आए थे
देवदह और राम ग्राम की पहचान पर काम करने वाले डॉ. परशुराम गुप्त के अनुसार सम्राट हर्ष के शासन काल में चीनी यात्री ह्वेनसांग ने महत्वपूर्ण बौद्ध स्थलों का भ्रमण किया था। इसी क्रम में वह देवदह भी आए थे।
1991 में पुरातत्विक सर्वेक्षण विभाग की पटना इकाई ने यहां आंशिक खनन कराया। रिपोर्ट में टीम ने स्तूप को गुप्त काल से पहले का बताया। साथ ही पालि विवरणों में कपिलवस्तु से देवदह की दूरी पांच योजन बताई गई है। चीनी यात्री फाह्यान ने भी अपने यात्रा विवरण में स्थानों की दूरियों का उल्लेख योजनों में किया है।
एक योजन 6.71 मील के बराबर था
कनिंघम की गणनानुसार फाह्यान का एक योजन 6.71 मील के बराबर था। कपिलवस्तु से बर्डपुर, मोहाना, लोटन, कोल्हुई व एकसड़वा होते हुए लक्ष्मीपुर ब्लॉक स्थित बनरसिया (देवदह) की दूरी 53 किमी पूरब है। इसी प्रकार कपिलवस्तु से लुम्बिनी, केवटलिया, बेतकुइयां, महदेवा (नेपाल), जोगियाबारी व एकसड़वा होते हुए बनरसिया की दूरी भी लगभग इतनी ही है। चीनी यात्री फाह्यान व ह्वेनसांग ने देवदह की दिशा कपिलवस्तु के पूरब बताई है। इस प्रकार दिशा और दूरी के आधार पर बनरसिया स्तूप देवदह साबित होता है।
रामग्राम बौद्ध कालीन कोलिय जनपद की राजधानी
रामग्राम भी बौद्ध कालीन कोलिय जनपद की राजधानी थी, जहां भगवान बुद्ध के निर्वाण के बाद उनकी अस्थियों के आठवें भाग पर एक धातु स्तूप निर्मित किया गया। आज भी इसे चिह्नित नहीं किया जा सका है। तीसरा अहम स्थल है कुंवरवर्ती स्तूप। यहां गृहत्याग के बाद भगवान बुद्ध ने अपने राजसी वस्त्र को त्याग कर सन्यासी का वेश धारण किया था। इन स्थलों को अगर संवारा गया तो महराजगंज जनपद विश्व के बौद्ध तीर्थस्थलों के बडे मानचित्र पर अपना अलग पहचान स्थापित कर लोगों को अपनी ओर आकर्षिक करेगा।