करीब डेढ़ साल पहले ही संपन्न हुए ब्लॉक प्रमुख और जिला पंचायत अध्यक्ष के चुनाव में पार्टी खुद के प्रत्याशी तक नहीं सहेज सकी थी और औंधे मुंह गिर गई। पार्टी ने जिसे प्रत्याशी घोषित किया वह दो दिन पहले ही मोबाइल स्वीच ऑफ कर नदारद हो गया और तलाशने के बाद भी नहीं मिला। आरोप लगे थे कि एक पदाधिकारी के जरिए रुपये की डील हो गई और उसने कदम पीछे कर लिए थे। पार्टी ने नामांकन के आखिरी दिन जिसे आनन-फानन में दोबारा प्रत्याशी घोषित किया, उसे भी वह पर्चा ही नहीं दाखिल करा सकी और भाजपा प्रत्याशी साधना सिंह निर्विरोध निर्वाचित हो गईं।
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सपा नेता दिनेश गुप्ता ने कहा कि मैं पार्टी का पुराना कार्यकर्ता हूं। मेरी, सक्रियता, निष्ठा को देखते हुए ही शीर्ष नेतृत्व ने वार्ड नंबर 69 श्रीराम चौक से मेरी पत्नी लाली गुप्ता को प्रत्याशी घोषित किया। रविवार को ही सिंबल आ गए मगर मुझे दौड़ाया जाता रहा। रात 11 मुझे फोन आया कि आकर अपना सिंबल ले जाइए। साथ ही बुलेटिन मेंबर, सक्रिय सदस्यता, वोटर लिस्ट की कॉपी भी लेते आइए।
कहा कि मैं क्षेत्र में प्रचार-प्रसार में जुटा था। आग्रह किया कि सिंबल अभी दे दीजिए, सुबह सारी औपचारिकता पूरी कर दूंगा। मैं पार्टी से कबसे जुड़ा हूं, यह किसी से छिपा नहीं है। बावजूद इसके मुझे परेशान किया गया। अगले दिन सुबह मुझे सिंबल दिया गया मगर मैं इतना आहत हो चुका था कि मैंने उसका इस्तेमाल नहीं किया और अपनी पत्नी से निर्दल प्रत्याशी के तौर पर पर्चा भराया।
पार्टी के पुराने नेता, वर्ष 2017 के पहले के दौर को याद करते हुए कहते हैं कि एक दौर वह था जब पार्टी में पदाधिकारी बनने या टिकट हासिल करने के लिए तमाम तरह की कसौटियों पर खरे पाए जाने के बाद ही सफलता मिलती थी। रिपोर्ट कार्ड देखा जाता था। पार्टी में सक्रियता, निष्ठा और ईमानदारी की कसौटी पर खरा उतरना तो अनिवार्य था। तभी नेतृत्व का मौका मिलता था। आज के नेताओं, कार्यकर्ताओं में अब पहले जैसा मनोबल ही नहीं दिखाई पड़ता। टिकट बंटवारे को लेकर आरोप-प्रत्यारोप का दौर चल रहा है, कोई टिकट पाकर पर्चा ही नहीं दाखिल कर रहा तो कोई टिकट ही लौटा दे रहा है। यह संकेत ठीक नहीं हैं।
सपा के पूर्व मंत्री डॉ. मोहसिन खान ने कहा कि एक कहावत है। मनोबल और इच्छा शक्ति ऊंची हो तो बंदूक वाले को भी चइला (लकड़ी के छोटे से टुकड़े) से खदेड़ा जा सकता है। 1993 में मैं विधायक रहा। मंत्री बना। 1996 और 2014-15 में दो-दो बार जिलाध्यक्ष की जिम्मेदारी संभाली है। 1996 में पार्टी मुखिया मुलायम सिंह यादव के आह्वान पर 37 दिन तक यहां जेल भरो आंदोलन चला था। मैं ही नहीं बाकी साथी कार्यकर्ता भी दौड़कर जाते थे गिरफ्तारी देने। लाठियां खाने से कभी गुरेज नहीं की। कई बार लाठी खाकर अस्पताल गए।
कहा कि अब इस मनोबल या इच्छा शक्ति का पार्टी में अभाव दिखता है। आज तो गेट पर ही गिरफ्तारी हो जा रही है। तमाम कसौटियों पर कसे जाने के बाद टिकट या किसी पद की जिम्मेदारी मिलती थी। नारे लगते थे। एक पैर रेल में एक जेल में। प्रदेश में कहीं भी आंदोलन होता था हम हिस्सा लेते थे। सक्रियता, निष्ठा, ईमानदारी के पैमाने पर टिकट मिलता था। अब तो टिकट के लिए कई तरह के गुणा-भाग लगाए जा रहे हैं। पार्टी नेता-कार्यकर्ता आपस में भिड़ जा रहे। आरोप-प्रत्यारोप का दौर चल रहा है। यह ठीक नहीं हैं। दु:ख होता है।
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सपा के पूर्व जिलाध्यक्ष चंद्रबली यादव ने कहा कि हमारे समय में जितने वरिष्ठ नेता होते थे, सभी को बैठाकर सहमति से टिकट का बंटवारा होता था। कई तरह के मानक थे, जिन्हें पूरा करने के बाद ही टिकट मिल पाता था। किसी भी पद पर चयन के लिए भी पार्टी की कसौटियों पर खरा उतरना पड़ता था। अब ऐसा नहीं है। एक-दो दिन पहले सदस्यता ग्रहण करने वालों को भी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी मिल जा रही है। निकाय चुनाव में चल रहे आरोप -प्रत्यारोप और बिना लड़ाई के ही किसी वार्ड में दूसरे को जीत समर्पित कर देने की घटनाओं से एक बात तो तय है कि हमारी तैयारी में कहीं न कहीं कमी है। जो पर्चा भर रहे हैं, उन्हें कौन ले आया, कब उनकी सदस्यता हुई, ऐसे कई मूल सवालों के जवाब को तलाशे जाने जरूरी हैं।
कहा कि वर्ष 2004 से 2007 तक जिलाध्यक्ष की जिम्मेदारी निभा चुका हूं। पहले पार्टी की रीति और नीति से काम होता था। अब काफी कुछ बदल गया है, जो ठीक नहीं है। किसी वार्ड में टिकट के लिए मार मची है तो कोई टिकट ही लौटा दे रहा है। जिसे मिल रहा, वह नामांकन नहीं कर रहा। एक वार्ड में तो सुबह किसी और को और शाम को किसी और को सिंबल दे दिया गया। नतीजतन पर्चों की जांच में एक प्रत्याशी निर्दल हो गया। ये सभी घटनाएं बताती हैं कि कहीं न कहीं योजनाएं बनाने में चूक हुई है।