वहीं दुकानदार भी परेशान हैं। जाम के चलते ग्राहक दुकान की ओर जाते ही नहीं हैं। लेकिन स्काई-वे बनने से ये मुश्किलें बहुत हद तक खत्म हो जाएंगी। शुक्रवार को दोपहर के एक बजे रेलवे बस स्टेशन के सामने सड़क की एक लेन पर बसों का कब्जा था और दूसरी लेन पर जाम। आड़े-तिरछे खड़ी बसों से लोग परेशान थे।
जाम में फंसे रोशन सिंह को स्टेशन पहुंचना था। जब जाम नहीं हटा तो ई-रिक्शा से नीचे उतर गए और खुद गाड़ियां हटवाने लगे। इसी तरह बस अड्डे से ट्रेन पकड़ने के लिए जा रहे सुशील पांडेय सामान लेकर उमस भरी गर्मी में परेशान थे। बोले- सुना है स्काई वे बनने वाला है। हम तो दिल्ली गए थे, वहां बहुत ही आराम है। यहां बन जाएगा तो परेशानी कम हो जाएगी।
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मुख्य जनसंपर्क अधिकारी पूर्वाेत्तर रेलवे पंकज कुमार सिंह ने कहा कि स्काई-वे का प्रस्ताव स्वीकृत है। जल्द ही निर्माण कार्य के लिए टेंडर की प्रक्रिया पूरी कर ली जाएगी। स्टेशन के पुनर्विकास योजना में यह शामिल है। सड़क चौड़ी करने और बस स्टेशन पर कार्य के लिए प्रदेश सरकार की ओर से काम कराया जाना है। इसके लिए मुख्यमंत्री के सामने प्रेजेंटेशन भी हो चुका है।
250 मीटर लंबा होगा स्काई-वे
यह स्काई-वे करीब 250 मीटर लंबा होगा। रेलवे स्टेशन के मध्य द्वार तक आए फुट ओवरब्रिज को इससे जोड़ा जाएगा, ताकि यात्री सीधे बाहर चले जाएं। रेलवे स्टेशन से बस स्टैंड आने-जाने में यात्रियों को बार-बार सीढ़ी से चढ़ना-उतरना या फिर सड़क पार करने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी। दृष्टिहीन लोगों के लिए इस पर खास तरह की फ्लोरिंग लगाई गई है। ग्लास पैनल के बाहर की तरफ गोलाकार स्ट्रक्चर बनाया गया है, जो रात में खास तरह की रंग-बिरंगी एलईडी लाइटों से जगमगाएगा।
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दुकानदारों का कहना है कि स्काई-वे बनने और सड़क चौड़ी करने से जाम से छुटकारा मिलने की उम्मीद है। इससे राहगीर और रोजगार दोनों को फायदा मिलेगा। हां, एक बात जरूर कहूंगा, दुकान तोड़ने या रास्ता बंद करने की योजना न बनाएं। विकास कार्य ऐसे हों कि सबको फायदा मिले। रेलवे बस स्टेशन के सामने संदीप की दुकान है। वे बताते हैं कि हर महीने दुकान का भाड़ा, बिजली और अन्य खर्च जोड़ दें तो करीब 25 हजार रुपये खर्च होता है, जबकि 40 हजार का भी माल नहीं बिक पा रहा है।
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केवल त्योहार व लगन में ही कुछ दुकानदारी चल पाती है। इस रोड पर भोजनालय चलाने वाले राजेश कहते हैं कि बसों की कतार के चलते कई बार यात्रियों को दुकान भी नहीं दिखती। गाड़ी खड़ी करने की जगह नहीं होने के चलते मजबूर रेल यात्रियों के अलावा कोई अन्य ग्राहक दुकान पर नहीं आ रहा है।