गोरखपुर एनवायरमेंटल एक्शन ग्रुप अध्यक्ष डॉ. शिराज अख्तर वजीह ने कहा कि स्थानीय मौसम पर व्यापक स्तर पर ग्लोबल वार्मिंग और स्थानीय कारणों का प्रभाव होता है। व्यापक स्तर पर होने वाले बदलाव वायु की गति, दिशा, वर्षा, नमी और समुद्री स्थितियों आदि को भी प्रभावित करता है।
स्थानीय हरित क्षेत्र, ताल-तलैये, वन आदि भी स्थानीय मौसम में अपना योगदान देते हैं। वर्तमान दिनों में घटती आर्द्रता और तापमान के कारण धूल व प्रदूषण के कणों की एक परत क्षेत्र के ऊपर जमा हो जाती है। इससे तापमान उसके नीचे ही बना रहता है और वायु की सघनता के कारण तापमान थोड़ा अधिक हो जाता है।
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गोविवि विभागाध्यक्ष बॉटनी प्रो. अनिल कुमार द्विवेदी ने कहा कि विकास कार्यों के चलते लगातार हो रहे निर्माण कार्य और उनसे उठने वाले धूल के कण भी प्रदूषण में काफी असरदायक हैं। इसके साथ ही सड़क चौड़ीकरण के लिए पेड़ों को काटने से भी प्रदूषण बढ़ रहा है। पेड़ का एक पत्ता साल में साढ़े पांच सौ लीटर ऑक्सीजन छोड़ता है। वहीं उसके पत्ते पर वायुमंडल में उड़ रहे कण चिपक जाते है। लेकिन हरियाली कम होने और प्रदूषण बढ़ने से उसका असर मौसम के चक्रानुक्रम पर भी पड़ा है।
ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में हो रही बढ़ोतरी
गोविवि बायोटेक्नोलॉजी विभाग प्रो. शरद कुमार मिश्रा ने कहा कि वर्तमान समय में वाहनों की संख्या में बेतहाशा वृद्धि, चौड़ी सड़कों का निर्माण, शहरीकरण के फैलाव से वृक्षों की संख्या में लगातार गिरावट के कारण वायुमंडल का तापमान अपेक्षा से अधिक गर्म है। वैश्विक स्तर पर ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में लगातार बढ़ोतरी से हो रही ग्लोबल वार्मिंग भी अपेक्षाकृत अधिक तापमान के लिए उत्तरदायी है।
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गोरखपुर व आसपास इलाकों में पिछले कुछ वर्षों में फोरलेन का निर्माण कार्य खूब हो रहा है। इसके चलते करीब 20 हजार पेड़ काट दिए गए हैं। पौधरोपण तो किया जाता है, पर कितने पौधे बच पाते हैं, यह कहना मुश्किल है। इसका सीधा असर पर्यावरण पर पड़ रहा है।
वन विभाग के अनुसार वर्ष 2018 में गोरखपुर-बड़हलगंज मार्ग पर 10448 पेड़ काट दिए गए। गोरखपुर-सोनौली मार्ग पर 1181 पेड़, गोरखपुर-महराजगंज मार्ग पर 8392 पेड़, गोरखपुर-देवरिया मार्ग पर 3140 पेड़, शहर के मोहद्दीपुर से लेकर जंगल कौड़िया तक 1,507 पेड़ों का कटान किया गया है।
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डीएफओ विकास यादव ने बताया कि जिले में वन विभाग ने पिछले पांच वर्षों में 6835 हेक्टेयर भूमि पर 72.06 लाख पौधे, जबकि वन विभाग सहित 27 विभागों ने मिलकर 2.15 करोड़ पौधे लगाए हैं। उन्होंने बताया कि फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, 2015 के 76 वर्ग किलोमीटर की तुलना में जिले में जंगल कवर के रूप में कुल क्षेत्रफल 79 वर्ग किलोमीटर बढ़ गया है। अभी भी गोरखपुर का वन आवरण 79 वर्ग किमी है।
नाक, कान व गला रोग विशेषज्ञ डॉ. अर्पित श्रीवास्तव ने कहा कि वायु प्रदूषण के चलते नाक में एलर्जी के मरीज बढ़े हैं। सर्दी-जुकाम के मरीज नियमित आ रहे हैं। इसके अलावा शोरगुल के चलते कान के मरीजों की संख्या भी बढ़ी है। इसलिए प्रदूषण वाले इलाके में जाएं तो मास्क जरूर पहनें। शोरगुल से बचें, अन्यथा अन्य बीमारियों की भी चपेट में आ जाएंगे।