साधु शरण की नतिनी नेहा।
- फोटो : अमर उजाला।
साधु शरण के पास 34 डिस्मिल जमीन थी। इसमें से 11 डिस्मिल जमीन वर्ष 2014 में बेच दी थी। उन्होंने जमीन का कुछ हिस्सा बेचा था, लेकिन खतौनी से साधु शरण का नाम ही कट गया था। इसी बीच साधु शरण ने 2016 में एक कारोबारी से जमीन का सौदा तय कर लिया। एग्रीमेंट भी हो गया। मृत बुजुर्ग की पुत्र वधु व पोती ज्योति के मुताबिक जमीन का एग्रीमेंट हुआ, लेकिन रुपये का भुगतान नहीं किया गया। जमीन का सौदा तय करने वालों ने साधु शरण को कानूनी दांवपेंच में उलझा दिया। इसी जमीन को दुरुस्त कराने के लिए साधु शरण तहसील का चक्कर काट रहे थे।
पुलिस-प्रशासन एक दिन के बाद कभी नहीं आए
साधु शरण की नतिनी नेहा का कहना है कि मौत के बाद अफसर और पुलिसवाले घर पर आए थे, लेकिन इसके बाद किसी ने कोई संपर्क नहीं किया। कई बार केस के बारे में भी पूछा गया, लेकिन कोई कुछ नहीं बताता है। जब मौत हुई थी तब अफसरों ने कहा था कि जमीन का कागज सही कराया जाएगा और दोषियों पर कार्रवाई भी होगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।
इस सजा का है प्रावधान
- धारा- 419, 420 (जालसाजी) सजा- तीन वर्ष
- धारा- 467 (वसीयत की कूटरचना) सजा-आजीवन कारावास या दस वर्ष की सजा व जुर्माना।
- धारा-468 (कूटरचित दस्तावेज से छल करना) सजा- सात साल व जुर्माना।
प्रशासन और पुलिस का जो रवैया है, उससे नहीं लगता कि तहसील परिसर में दम तोड़ने वाले साधु शरण को न्याय मिल पाएगा। प्रशासनिक अफसर एक तरह से पूरे मामले से पल्ला झाड़ते नजर आ रहे हैं। ऐसे में साफ है कि न्याय मिलना कठिन होगा। जो परिवार कायदे से अपना खर्चा नहीं चला सकता है, वह भू-माफिया से कैसे लड़ सकता है।
सीओ खजनी इंदु प्रभा सिंह ने बताया कि पुलिस इस मामले में केस दर्ज कर जांच कर रही है। कूटरचित दस्तावेज तैयार करने का कोई साक्ष्य नहीं मिलने से गिरफ्तारी नहीं की गई है। साक्ष्यों के आधार पर जांच जारी है, जांच के आधार पर कार्रवाई की जाएगी।
एसडीएम खजनी पवन कुमार ने बताया कि जांच में दो लोग दोषी पाए गए थे, जिनके खिलाफ केस दर्ज है। अनुबंध पंजीकृत है, लिहाजा उसे खारिज करने का अधिकार सिविल कोर्ट के पास है।