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गोरखपुर: तहसील परिसर में मरने वाले साधु शरण को नहीं मिल सका इंसाफ, जमीन दिलाने का दम भरने वाले अफसर भी खामोश

Fri, 06 Aug 2021 01:14 PM IST
vivek shukla अमर उजाला नेटवर्क, गोरखपुर।

सार

अफसरों के दबाव में केस दर्ज किया पर भूल गई पुलिस। सात साल चक्कर काटने के बाद साधु शरण ने तहसील परिसर में तोड़ दिया था दम।
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साधु शरण की फाइल फोटो। - फोटो : अमर उजाला।
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विस्तार
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उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले में अपनी जमीन की खतौनी ठीक कराने और कब्जा पाने के लिए साल साल से दौड़ भाग करने वाले खुटभार के साधु शरण विश्वकर्मा (65) को मौत के बाद भी न्याय नहीं मिल सका। उनकी मौत के बाद एक बारगी पुलिस और प्रशासन के अफसर इस तरह से दौड़े कि लगा कि अब शायद साधु शरण के परिवार को न्याय मिल जाएगा, मगर ऐसा हो नहीं सका। यह कवायद सिर्फ दिखावा ही साबित हुई।
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दबाव में पुलिस ने भू- माफिया पर केस भी दर्ज कर लिया था, लेकिन समय के साथ उसे भी दबा दिया गया। जांच के नाम पर पुलिस की फाइल खुली है पर आज तक इसमें गिरफ्तारी तक नहीं हो सकी है। गांव में जाकर दावे करने वाले अफसर भी खामोश बैठ गए। लेखपाल एक दिन के बाद दोबारा नहीं गए और पीड़ित परिवार खुद की बदनसीबी को ही अपनी नियति मानकर सिस्टम के सामने घुटने टेक चुका है।  

जानकारी के मुताबिक, 17 जुलाई को संपूर्ण समाधान दिवस के दिन अपनी फरियाद लेकर साधु शरण खजनी तहसील में गए थे। यहां पर इंसाफ पाने की चाह में लाइन में लगे साधु शरण की मौत हो गई थी। पहले तो प्रशासनिक अफसरों ने मौत पर ही पर्दा डालने की कोशिश की लेकिन, फिर मामले के तूल पकड़ने पर शव को पोस्टमार्टम के लिए भेजा गया। एसडीएम खजनी पवन कुमार, सीओ खजनी इंदु प्रभा सिंह भी साधु शरण के घर पहुंच गईं। अफसरों ने इंसाफ दिलाने के इतने बड़े-बड़े वादे किए कि साधु शरण के परिवार को लगा कि शायद उनकी मौत के बाद ही सही, इंसाफ तो मिल ही जाएगा। पुलिस ने इस मामले में जिनका नाम सामने आया था उसके खिलाफ धोखाधड़ी,  कूटरचित दस्तावेज तैयार कर जालसाजी करने, धमकी देने की धारा के तहत केस दर्ज करने की औपचारिकता भी पूरी कर ली। पर इस मामले में आज तक कोई कार्रवाई नहीं हो सकी है।
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यह था मामला

साधु शरण की नतिनी नेहा। - फोटो : अमर उजाला।

साधु शरण के पास 34 डिस्मिल जमीन थी। इसमें से 11 डिस्मिल जमीन वर्ष 2014 में बेच दी थी। उन्होंने जमीन का कुछ हिस्सा बेचा था, लेकिन खतौनी से साधु शरण का नाम ही कट गया था। इसी बीच साधु शरण ने 2016 में एक कारोबारी से जमीन का सौदा तय कर लिया। एग्रीमेंट भी हो गया। मृत बुजुर्ग की पुत्र वधु व पोती ज्योति के मुताबिक जमीन का एग्रीमेंट हुआ, लेकिन रुपये का भुगतान नहीं किया गया। जमीन का सौदा तय करने वालों ने साधु शरण को कानूनी दांवपेंच में उलझा दिया। इसी जमीन को दुरुस्त कराने के लिए साधु शरण तहसील का चक्कर काट रहे थे।

पुलिस-प्रशासन एक दिन के बाद कभी नहीं आए
साधु शरण की नतिनी नेहा का कहना है कि मौत के बाद अफसर और पुलिसवाले घर पर आए थे, लेकिन इसके बाद किसी ने कोई संपर्क नहीं किया। कई बार केस के बारे में भी पूछा गया, लेकिन कोई कुछ नहीं बताता है। जब मौत हुई थी तब अफसरों ने कहा था कि जमीन का कागज सही कराया जाएगा और दोषियों पर कार्रवाई भी होगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

इस सजा का है प्रावधान
  • धारा- 419, 420 (जालसाजी) सजा- तीन वर्ष
  • धारा- 467 (वसीयत की कूटरचना) सजा-आजीवन कारावास या दस वर्ष की सजा व जुर्माना।
  • धारा-468 (कूटरचित दस्तावेज से छल करना) सजा- सात साल व जुर्माना।
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ऐसे तो साधु शरण को कभी नहीं मिल पाएगा न्याय

प्रशासन और पुलिस का जो रवैया है, उससे नहीं लगता कि तहसील परिसर में दम तोड़ने वाले साधु शरण को न्याय मिल पाएगा। प्रशासनिक अफसर एक तरह से पूरे मामले से पल्ला झाड़ते नजर आ रहे हैं। ऐसे में साफ है कि न्याय मिलना कठिन होगा। जो परिवार कायदे से अपना खर्चा नहीं चला सकता है, वह भू-माफिया से कैसे लड़ सकता है।

सीओ खजनी इंदु प्रभा सिंह ने बताया कि पुलिस इस मामले में केस दर्ज कर जांच कर रही है। कूटरचित दस्तावेज तैयार करने का कोई साक्ष्य नहीं मिलने से गिरफ्तारी नहीं की गई है। साक्ष्यों के आधार पर जांच जारी है, जांच के आधार पर कार्रवाई की जाएगी।
 
एसडीएम खजनी पवन कुमार ने बताया कि जांच में दो लोग दोषी पाए गए थे, जिनके खिलाफ केस दर्ज है। अनुबंध पंजीकृत है, लिहाजा उसे खारिज करने का अधिकार सिविल कोर्ट के पास है।
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