बीआरडी मेडिकल कॉलेज में दूसरी बार किसी मरीज को पेसमेकर लगाया गया है। डॉक्टरों ने ब्लड प्रेशर और शुगर के मरीज को पेसमेकर लगाकर उसकी जान बचाई है। पेसमेकर की सुविधा शुरू होने के बाद आर्थिक रुप से कमजोर मरीजों को निजी अस्पतालों की ओर रुख नहीं करना पड़ेगा।
जानकारी के मुताबिक, बेलघाट निवासी सुरेंद्र शाही (65) को ब्लड प्रेशर और शुगर की दिक्कत 10 वर्षों से है। 28 अक्तूबर को परिजन बेहोशी की हालत में बीआरडी मेडिकल कॉलेज लेकर उन्हें आए। प्राचार्य डॉ. गणेश कुमार ने बताया कि मेडिसिन इमरजेंसी वार्ड नंबर 14 में मरीज को डॉक्टरों ने भर्ती कराया। तत्काल सीपीआर (दिल का मसाज) देकर मरीज को वेंटिलेटर पर डाला गया। तब जाकर मरीज की जान बच पाई। इस बीच जांच की गई तो पता चला कि पेसमेकर लगाना पड़ेगा। इस पर अस्थाई पेसमेकर लगाया गया।
प्राचार्य ने बताया कि अस्थाई पेसमेकर लगाते ही मरीज की हालत बिगड़ने लगी। इसके बाद मरीज को फिर से सीपीआर दिया गया, जिसकी वजह से हालत स्थिर हो गई। मरीज की स्थिति को देखने के बाद कॉलेज के मेडिसिन विभाग ने कैथलैब में स्थाई पेसमेकर लगाने का फैसला लिया गया। स्थायी पेसमेकर लगने के बाद मरीज की हालत में सुधार हो रहा है। डॉक्टरों के इस प्रयास से परिजन बेहद खुश हैं।
यह लोग टीम में रहे मौजूद
प्राचार्य ने बताया कि इस सफल पेसमेकर लगाने से पूर्वांचल के मरीजों में आशा की नई किरण जगी है। पेसमेकर के लिए मरीजों को लखनऊ और दिल्ली जैसे बड़े शहरों के चक्कर नहीं लगाने पड़ेंगे। साथ ही मरीजों की समय के साथ आर्थिक रूप से बचत भी होगी। क्योंकि निजी अस्पतालों में पेसमेकर लगाने का चार्ज एक से डेढ़ लाख रुपये से अधिक हैं। मरीज का इलाज करने वाली टीम में मेडिसिन विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ महिम मित्तल, डॉ नीरज चौधरी, डॉ अजीत प्रताप सिंह, डॉ शूलपाणि मिश्र, डॉ चंद्रमौलि मिश्र आदि मौजूद रहे।
पेसमेकर के लिए प्राचार्य का अनुमोदन जरूरी
अगर किसी जरूरतमंद को बीआरडी मेडिकल कॉलेज में पेसमेकर लगवाना हो तो उसे वहां पर इलाज कराना होगा। जांच में पता चलता है कि मरीज को पेसमेकर की जरूरत है तो बीआरडी मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य के अनुमोदन पर मरीज को पेसमेकर लगाया जाएगा। क्योंकि पेसमेकर लगवाने का खर्च काफी महंगा है, जो बिना प्राचार्य के अनुमोदन के संभव नहीं है।
11 साल बाद किसी मरीज को लगा है पेसमेकर
बीआरडी मेडिकल कॉलेज में 11 साल बाद किसी मरीज को पेसमेकर लगाया गया है। इससे पूर्व 2008 में अंतिम बार डॉ. मुकुल मिश्रा की अगुवाई में पेसमेकर मरीज को लगाया गया था लेकिन उनके सेवानिवृत्ति के बाद पेसमेकर लगाने का काम बंद कर दिया गया था।