गोरखनाथ मंदिर परिसर स्थित महंत दिग्विजय नाथ स्मृति सभागार में आयोजित श्रीमद् भागवत महापुराण कथा
गोरखपुर। महंत दिग्विजयनाथ एवं अवेद्यनाथ की पुण्यतिथि के अवसर पर गोरखनाथ मंदिर में आयोजित साप्ताहिक श्रीमद्भागवत कथा के तीसरे दिन कथा व्यास कृष्णचंद्र शास्त्री ठाकुर ने कहा कि श्रीमद्भागवत कथा हमें धर्म के साथ जीना सिखाती है। हम कितना जीते हैं, यह महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि हम कैसे जीते हैं, यह महत्वपूर्ण होता है। गीता में भगवान ने कहा है कि मन को नियंत्रण में करो। मन ही संसार के बंधन और मोक्ष का कारण है। हमें विषम परिस्थितियों में भी मुस्कुराते रहना चाहिए। क्रोध पर विजय पाने वाला ही भगवान की भक्ति का पात्र बनता है।
कथा व्यास ने कहा कि धर्म की परिभाषा अनेक है, लेकिन सबसे बड़ा धर्म राष्ट्र धर्म है। राष्ट्र धर्म ही सनातन धर्म है और सनातन धर्म ही राष्ट्र धर्म है। कथा व्यास ने कहा कि व्यक्ति को कुसंग का हमेशा त्याग करना चाहिए। यदि संग करना है तो संत प्रवृति के लोगों का करना चाहिए। इंद्रियों को वश में कर लेने वाला व्यक्ति कुछ भी प्राप्त कर सकता है। हमें चिंता नहीं चिंतन करना चाहिए। समस्या तब होती है, जब हम चिंता छोड़ते नहीं और चिंतन करते नहीं।
उन्होंने कहा कि भगवान अपने भक्तों के अधीन होते हैं। जहां भक्तों की कथा हो, जहां भक्तों का मन रहता हो, भगवान भी वहीं निवास करते हैं। भगवान न ज्ञान से प्राप्त होते हैं न ही कुलीन कुल से। गजराज कोई ज्ञानी नहीं था किंतु गोविंद नाम लेते ही भगवान उसकी रक्षा करने पहुंच गए। श्रीकृष्ण ने दासी पुत्र विदुर के घर जाकर साग खाया।