जिला अस्पताल के मनोचिकित्सक डॉ. अमित शाही ने बताया कि गेम की लत से बच्चों की सेहत भी प्रभावित हो रही है। वे डिप्रेशन और एंजाइटी का शिकार हो रहे हैं। ऐसे बच्चों की काउंसिलिंग की जा रही है। अभी केवल पांच फीसदी बच्चों को दवा की जरूरत पड़ रही है। माता-पिता को भी समझाया जा रहा है कि बच्चों को मोबाइल से दूर रखें। लेकिन अचानक नहीं, धीरे-धीरे एक नियम बनाएं और उन्हें मोबाइल के इस्तेमाल से रोकें।
बच्चों का अकेलापन भी बड़ा कारण
डॉ. अमित शाही ने बताया कि इस तरह के मामलों का दूसरा सबसे बड़ा कारण बच्चों का अकेलापन है। बच्चों ने खुद बताया कि उन्हें मम्मी और पापा समय नहीं देते हैं। घर में कोई भी बुजुर्ग नहीं हैं, जो उनसे बातें करे, सवालों के जवाब दे, उनके साथ खेले। यही कारण है कि ऐसे बच्चों का ज्यादा वक्त मोबाइल में बीत रहा है। इसलिए अभिभावकों की भी काउंसिलिंग की जा रही है कि बच्चों को समय दें, जिससे वे मोबाइल के इस्तेमाल से बच सकें।
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हैप्पी हार्मोंस भी वजह
डॉ. अमित शाही के अनुसार, ऑनलाइन गेम या अन्य मनोरंजक साधनों के इस्तेमाल से बच्चों के मस्तिष्क में न्यूरो केमिकल रिसाव होता है, जिसे हैप्पी हार्मोंस भी कहते हैं। इस बीच अचानक उसे गेम खेलने से रोक दिया जाए तो हैप्पी हार्माेंस का रिसाव रुक जाता है। इसकी वजह से बच्चे डिप्रेशन में आने लगते हैं। ऐसे बच्चों को काउंसिलिंग और दवाओं की जरूरत पड़ रही है।
इन गेम का असर दिमाग पर ज्यादा
चाइनीज गेम पब-जी के बैन होने के बाद भी कई ऐसे गेम हैं, जो बच्चों के दिमाग पर ज्यादा असर डाल रहे हैं। इनमें एफपीएस कमांडो सिक्रेट मिशन, निन्जा आरसी, निन्जा राइडेन रिवेंज, स्टॉर्म फाल सागा ऑफ सरवाइकल, रोबोलाॅक्स, रेड वाइपर जैसे गेम ज्यादा हिंसक हैं। यह मारधाड़ वाले गेम हैं। 90 फीसदी बच्चे इन्हीं गेम को खेलते हैं।