जानकारी के मुताबिक, सरकारी एंबुलेंस 108 या 102 के सेवा विस्तार की योजना तो है मगर उसकी सुविधा ले पाना आसान नहीं है। ऐसे में इमरजेंसी पड़ने पर एंबुलेंस के दलाल तीमारदार को ऐसा समझाते हैं कि वह नहीं पहुंचाया तो उनकी जान ही चली जाएगी। परेशान लोगों को यही सच्चे मददगार नजर आते हैं और मजबूरी में मुफ्त की सेवा का पांच हजार से सात हजार रुपये देते हैं।
इसकी कीमत भी वक्त पर निर्भर करता है। समय यदि रात का है तो रुपया भी ज्यादा लगेगा है। पुलिस ने सख्ती की तो एंबुलेंस मरीज माफिया पकड़े जाने लगे। एंबुलेंस को सीज करने के साथ ही अब उसका दूसरा सच भी सामने आने लगा है कि ये एंबुलेंस सिर्फ मरीज से ठगी ही नहीं, बल्कि जान भी जोखिम में डाल रही हैं।
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एसपी नार्थ मनोज अवस्थी ने बताया कि पुलिस एंबुलेंस मरीज माफिया पर पुलिस लगातार कार्रवाई कर रही है। संबंधित विभागों को भी इसकी जानकारी भेजी जाती है।
- एंबुलेंस में प्रशिक्षित पैरा-मेडिकल स्टाफ होने चाहिए
- ऑक्सीजन सिलिंडर और फिल्टर पानी व्यवस्था होनी चाहिए
- इमरजेंसी के लिए आवश्यक दवाएं होनी चाहिए
- रॉयल्स ट्यूब होना चाहिए (इसका इस्तेमाल जहर निगलने के केस में पेट से निकालने के लिए होता है)
- स्टेथेस्कोप, बीपी मॉनीटर, फोल्डिंग मशीन और पावरफुल टॉर्च भी होना अनिवार्य है।
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मानकों की अनदेखी, कभी नहीं होती चेकिंग
एंबुलेंस के नाम पर इन गाड़ियों को रजिस्ट्रेशन में भी फायदा मिलता है। नियमानुसार रजिस्ट्रेशन के समय इनमें सारे जीवन रक्षक उपकरण होने चाहिए। एंबुलेंस का टोल टैक्स नहीं लगता है, उसका चालान नहीं होता है। यही नहीं सड़कों पर दौड़ रही प्राइवेट एंबुलेंस में जीवन रक्षक उपकरण है या नहीं इसकी हकीकत जानने की जहमत जिम्मेदार अफसरों ने कभी नहीं उठाई। स्वास्थ्य विभाग और न तो आरटीओ ने हकीकत जानने का प्रयास किया। बस नीली बत्ती हूटर का सहारा लेकर यह फर्राटे भरते हैं।