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जमीन हड़पने का मामला: कागजों में भी जिंदा हो गए नूर मोहम्मद, न्याय मिला तो खुशी से झूम उठा परिवार, मिठाई खिलाकर जताई खुशियां

Sun, 24 Oct 2021 11:38 AM IST
vivek shukla अमर उजाला ब्यूरो, गोरखपुर।

सार

नूर मोहम्मद को गांव के ही कुछ लोगों ने 2008 में हुई चकबंदी के दौरान जालसाजी कर अभिलेखों में मृत दिखा दिया था। इन लोगों ने फर्जी दस्तावेज के आधार पर उनकी पैतृक जमीन और मकान हड़प लिया था।
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न्याय मिलने पर परिवार के साथ खुशी मनाते नूर मोहम्मद। - फोटो : अमर उजाला।
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विस्तार
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आखिरकार नूर मोहम्मद राजस्व दस्तावेजों में भी जिंदा हो गए। शनिवार को सहायक चकबंदी अधिकारी सहजनवां राकेश तिवारी ने नूर मोहम्मद का जिंदा होना प्रमाणित कर दस्तावेज तहसील को भेज दिया। कागजात में जिंदा हुए नूर मोहम्मद अब कुछ कानूनी औपचारिकताओं के साथ हीअपनी पैतृक जमीन और आवास के कानूनी तौर पर मालिक हो जाएंगे। कागजात में मार देने की साजिश का शिकार होकर जमीन और आवास खो देने वाले नूर मोहम्मद को उनका हक दिलाने की अमर उजाला की मुहिम शनिवार को रंग लाई।  
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सहजनवां तहसील क्षेत्र के जैतपुर गांव के गौसपुर निवासी नूर मोहम्मद को गांव के ही कुछ लोगों ने 2008 में हुई चकबंदी के दौरान जालसाजी कर अभिलेखों में मृत दिखा दिया था। इन लोगों ने फर्जी दस्तावेज के आधार पर उनकी पैतृक जमीन और मकान हड़प लिया था। करीब तीस वर्ष बाद गांव लौटे नूर मोहम्मद को धोखाधड़ी की जानकारी हुई तो उन्होंने सितंबर से प्रशासन और राजस्व विभाग के दरवाजे खटखटाने शुरू किए।

उनकी समस्या को अमर उजाला ने पहली बार 23 सितंबर को प्रमुखता से प्रकाशित किया था। इसके बाद उनको न्याय दिलाने के लिए सिलसिलेवार खबरें लिखी जाती रहीं। अमर उजाला में खबर प्रकाशित होने से अधिकारियों ने भी इसमें सक्रियता दिखाई और महज एक माह में पीड़ित को न्याय मिल गया और उन्हें राजस्व अभिलेखों में जिंदा कर दिया गया।
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न्याय मिलने की जानकारी होने पर नूर मोहम्मद और उनके परिजन खुशी से झूम उठे। सबने नूर मोहम्मद का मुंह मीठा करवाया। मायूस हो चुके नूर मोहम्मद के चेहरे पर भी मुस्कान लौट आई। उन्होंने खुशी का इजहार करते हुए कहा कि अब वह उनके साथ धोखाधड़ी करने वालों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई करवाने का प्रयास करेंगे। उम्मीद जताई है कि उन लोगों के खिलाफ शीघ्र ही मुकदमा दर्ज कर उनके कृत्य की सजा दी जाएगी, तब इन्हें पूरा न्याय मिलेगा।
 
सहजनवां के सहायक चकबंदी अधिकारी राकेश तिवारी ने बताया कि नूर मोहम्मद मामले में अधिकारियों ने अभियान की तरह सुलझाने का लगातार निर्देश दिया। इसका असर है कि उन्हें अभिलेखों में जिंदा होना प्रमाणित किया गया है। पीड़ित को मालिकाना हक के लिए मालिकाना रजिस्टर में अमल दरामद कर दिया गया है। दो दिन के भीतर इसकी नकल भी उन्हें दे दी जाएगी।
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तहसील प्रशासन की भूमिका संदेह के घेरे में

नूर मोहम्मद के मामले में तहसील प्रशासन की भूमिका संदेह के घेरे में रही है। इस मामले में कमिश्नर रवि कुमार एनजी व डीएम विजय किरन आनंद ने सख्ती से तहसील प्रशासन से जवाब तलब किया था। इसी का नतीजा रहा कि दबाव बना और नूर मोहम्मद को राजस्व अभिलेखों में जिंदा घोषित कर दिया गया। सोमवार को आदेश भी मिल जाएगा।

उपन्यासकार ने बताई तहसीलों में सिस्टम की लाचारी
कथाकार श्रीलाल शुक्ल के उपन्यास राग दरबारी में भी तहसीलों के लाचार सिस्टम को दर्शाया गया है। इसके किरदार आजमगढ़ के लाल बिहारी हैं। लाल बिहारी को राजस्व दस्तावेज में मृत घोषित कर दिया गया था। खुद को जिंदा साबित करने के लिए वह 18 वर्ष तक तहसील के चक्कर काटते रहे। निराश हुए तो खुद का नाम ही मृतक रख लिया। इस पर फिल्म भी बनी और ओटीटी पर रिलीज हुई है। 18 वर्ष बाद उन्हें न्याय मिल सका, लेकिन अमर उजाला की वजह से नूर मोहम्मद को एक महीने में ही न्याय मिल गया। अगर देश व प्रदेश के तहसीलों के रिकार्ड जंचवाए जाएं तो इस तरह के तमाम मामले सामने आ सकते हैं।
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