इसके बाद वह अपनी जाति की राजनीति में जुट गए। वर्ष 2008 में उन्होंने ऑल इंडिया बैकवर्ड एंड माइनारिटी वेलफेयर मिशन और शक्ति मुक्ति महासंग्राम नाम के दो संगठन भी बनाए। इसके अलावा राष्ट्रीय निषाद एकता परिषद बनाई और बतौर राष्ट्रीय अध्यक्ष निषादों की विभिन्न उपजातियों को एक करने का प्रयास किया।
इन सबके बीच उन्होंने निषाद पार्टी का भी गठन किया। इसके बाद वह 2017 में निषाद पार्टी से खुद गोरखपुर ग्रामीण से चुनाव लड़े और 34,869 वोट पाकर हार गए। जबकि, उनकी पार्टी के प्रत्याशियों को कैंपियरगंज, सहजनवां, खजनी, तमकुहीराज, भदोही, पनियरा, चंदौली में 10 हजार से अधिक वोट मिले। कुल वोट की बात करें तो यह आंकड़ा 5,40,539 मतों तक पहुंच गया था। इसके बाद पार्टी का कद बढ़ता चला गया।
2018 का उप लोकसभा चुनाव रहा टर्निंग प्वाइंट
2017 के विधानसभा चुनाव में डॉ. संजय कुमार निषाद गोरखपुर ग्रामीण सीट से चुनाव लड़े, लेकिन हार गए। इस बीच 2018 में गोरखपुर शहर सीट से लोकसभा के उप चुनाव में इंजीनियर बेटे प्रवीण निषाद पर सपा ने दांव खेला और शहर सीट से पहली बार बेटे को चुनाव लड़ाकर सांसद बना दिया।
यही चुनाव डॉ. संजय निषाद के लिए टर्निंग प्वाइंट साबित हो गया। इसके बाद 2019 के लोकसभा चुनाव में सपा से गठबंधन तोड़कर भाजपा के गठबंधन से बेटे को संतकबीरनगर से चुनाव लड़ाया और मोदी लहर में प्रचंड जीत के साथ दूसरी बार संसद भेजा।
सात सीटों पर लड़ाया चुनाव, सब पर मिली जीत
विधानसभा चुनाव में डॉ. संजय निषाद ने भाजपा के साथ गठबंधन करते हुए गोरखपुर और बस्ती मंडल में कुल सात सीटें मांगी। सभी सीटों पर प्रत्याशियों ने जीत दर्ज करते हुए निषाद पार्टी का कद और ऊंचा कर दिया है। उन्होंने अपने छोटे बेटे श्रवण निषाद को बीजेपी के सिंबल पर चौरीचौरा और डॉ. असीम कुमार को कुशीनगर के तमकुही राज विधानसभा क्षेत्र से टिकट दिलाया।
इसके अलावा पार्टी के सिंबल भोजन भरी थाली से मेंहदावल विधानसभा सीट से अनिल कुमार त्रिपाठी, कुशीनगर जिले के खड्डा विधानसभा क्षेत्र से विवेकानंद पांडेय और महराजगंज के नौतनवां विधानसभा क्षेत्र से ऋषि मणि त्रिपाठी को उतारा।