विश्वविद्यालय के सूत्रों के मुताबिक, जांच में पाया गया है कि बीटेक प्रवेश की काउंसिलिंग के दौरान जिम्मेदारों ने फर्जी दस्तावेजों की जांच नहीं की। बाकायदा उसे स्वीकृति देकर प्रवेश की अनुमति दे दी। वहीं लिपिकों ने भी काउंसिलिंग के लिए बनी सूची की जांच-पड़ताल किए ही सारी औपचारिकताएं पूरी करा दीं।
इसमें प्रवेश कार्य से जुड़े दो से तीन शिक्षक व चार कर्मचारी जांच के दायरे में हैं। कार्य परिषद से अगर कार्रवाई की हरी झंडी मिलती है तो इन्हें मेजर चार्जशीट अलग से इनके खिलाफ जांच शुरू कराई जाएगी। वहीं फर्जी दस्तावेजों के आधार पर प्रवेश लेने वाले छात्रों के खिलाफ केस दर्ज कराया जा सकता है।
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हाईकोर्ट से भी छात्रों को नहीं मिली राहत
प्रवेश निरस्त होने के बाद 40 में से 35 छात्रों ने हाईकोर्ट की शरण ले ली। हाईकोर्ट के निर्देश पर 31 जनवरी तक छात्रों को साक्ष्य उपलब्ध कराने का समय दिया गया। 31 छात्रों ने साक्ष्य उपलब्ध करा दिए। विश्वविद्यालय की जांच समिति ने साक्ष्यों का परीक्षण कराया और उसे विद्या परिषद के समक्ष रखा गया। विद्या परिषद ने प्रवेश पर रोक लगाने के फैसले को बहाल रखा। छात्रों ने हाईकोर्ट में परीक्षा कराने के लिए याचिका दाखिल की। कोर्ट के निर्देश पर विवि ने छात्रों की परीक्षा कराकर इस सील करा दिया।
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कंप्यूटर साइंस विभाग की एक छात्रा की संदिग्ध गतिविधियों का संज्ञान लेते हुए एक प्रोफेसर ने उससे प्रवेश का आवंटन पत्र मांगा। उसने जो पत्र दिया, वह तो फर्जी था ही, प्रवेश के लिए जमा की गई फीस की रसीद भी फर्जी मिली।
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प्रोफेसर ने जब यह जानकारी विश्वविद्यालय प्रशासन को दी, तो कुलपति प्रो. जेपी पांडेय ने सभी ब्रांच के प्रवेश की जांच के लिए तीन सदस्यीय कमेटी का गठन कर दिया। जांच में चौंकाने वाले तथ्य सामने आए। शुल्क और आवंटन पत्र के मिलान में पाया गया कि कई छात्रों का प्रवेश सूची से भिन्न नामों से है। विश्वविद्यालय प्रशासन ने जांच के बाद 40 छात्रों का प्रवेश निरस्त कर दिया था।
एमएमएमयूटी कुलपति प्रो. जेपी पांडेय ने कहा विश्वविद्यालय में 20 जुलाई को कार्य परिषद की बैठक बुलाई गई है। इसमें बीटेक प्रवेश में फर्जीवाड़े की जांच कर रही कमेटी की रिपोर्ट रखी जाएगी। रिपोर्ट को लेकर विधिक राय भी ले ली गई है। कार्य परिषद में लिए गए निर्णय के आधार पर कार्रवाई की जाएगी।