प्राचीन भारत में नालंदा जैसे कई विश्वस्तरीय विश्वविद्यालयों ने दुनिया भर में हमें सम्मानित किया था। दुनिया के विभिन्न हिस्सों से विद्वान ज्ञान की खोज में भारत आए थे। उस अतीत के गौरव को वापस लाने की आवश्यकता है, ताकि हमारे छात्रों को जनसांख्यिकीय लाभांश प्राप्त करने के लिए विश्व स्तर पर रोजगार के योग्य बनाया जा सके। इससे हमारे उत्पादों और सेवाओं को विश्व स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाकर आत्मनिर्भर भारत बनाने में योगदान दिया जा सकता है।
ये बातें मदन मोहन मालवीय प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के छठवें दीक्षांत समारोह के मुख्य अतिथि व धनबाद व मंडी आईआईटी के प्रशासकीय परिषद के अध्यक्ष प्रो. प्रेमव्रत ने कहीं। प्रो. प्रेमव्रत ने कहा कि नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी 2020) एक महान नीति दस्तावेज है, जिसका उद्देश्य हमारी शिक्षा को समग्र बनाना है। समाज की समस्याओं को हल करने के लिए ज्ञान, कौशल और सकारात्मक दृष्टिकोण की आवश्यकता होती है।
दीक्षांत समारोह किसी संस्थान की उपलब्धियों का जश्न मनाने का अवसर है, लेकिन यह आत्म निरीक्षण का भी एक अवसर है। हमारे संस्थागत लक्ष्यों और उद्देश्यों को इसके अस्तित्व के वर्षों में किस हद तक पूरा किया जा रहा है। आपने अच्छा कार्य किया है, लेकिन सुधार की यात्रा कभी न खत्म होने वाली यात्रा है।
सभी क्षेत्रों में आगे सुधार के लिए अपने अकादमिक प्रदर्शन में संबंधित क्षेत्रों की पहचान करना, बुनियादी ढांचे, प्रणालियों और नीतियों को पिछले प्रदर्शन से लगातार बेहतर बनाना प्रयासों का एक अभिन्न अंग होना चाहिए। चूंकि इंजीनियरों और प्रौद्योगिकीविदों को किसी भी समस्या के समाधान की संरचना के लिए बेहतर प्रशिक्षित किया जाता है, इसलिए समस्या समाधान के लिए संकुचित और अदूरदर्शी दृष्टिकोण से बचना चाहिए।
समस्या को एक एकीकृत तंत्र के रूप में देखना चाहिए जो इसके तकनीकी, आर्थिक, सामाजिक, पर्यावरण, मानव, कानूनी और सरकारी परिप्रेक्ष्य के साथ समग्र स्थायी समाधान खोजने के लिए सक्षम हो। तकनीकी परिवर्तन इतनी तेजी से हो रहे हैं कि हम सभी को कई नए विचारों और अवधारणाओं को सीखने, छोड़ने और फिर से सीखने की जरूरत है जो शायद आपके पाठ्यक्रम का हिस्सा नहीं थे। इसलिए आजीवन सीखने की धारणा आपका ध्येय होना चाहिए।