मकर संक्रांति का पर्व शनिवार यानी 15 जनवरी को मनाया जाएगा। श्रद्धालु इस दिन पवित्र राप्ती नदी सहित आसपास की अन्य पवित्र नदियों एवं सरोवरों में आस्था की डुबकी लगाएंगे। साथ ही भगवान भाष्कर की पूजा कर दान-पुण्य करेंगे।
वाराणसी से प्रकाशित ऋषिकेश पंचांग के अनुसार 14 जनवरी शुक्रवार की रात 8:49 बजे सूर्य का मकर राशि में प्रवेश हो रहा है। वहीं इसका पुण्यकाल अगले दिन 15 जनवरी शनिवार को दोपहर 12:49 बजे तक रहेगा। ऐसे में मकर संक्रांति मनाने के लिए शनिवार का दिन उत्तम रहेगा। मकर संक्रांति के समय रोहिणी और मृगशिरा नक्षत्र का योग है। संक्रांति के समय ब्रह्म योग और बालव करण है। यह संक्रांति चंद्रमा के वृषभ राशि में घटित हो रही है। इस दिन मित्र नामक महाऔदायिक योग भी है।
मकर संक्रांति का महत्व
पंडित शरद चंद्र मिश्रा के अनुसार, हिंदू धर्म में सूर्य देव को प्रत्यक्ष देव कहा गया है। जो प्रतिदिन साक्षात दर्शन देकर सारे जगत में ऊर्जा का संचार करते हैं। ज्योतिष में सूर्य को नवग्रहों का स्वामी माना जाता है। मान्यता है कि सूर्य अपनी नियमित गति से राशि परिवर्तन करते हैं। सूर्य के इसी राशि परिवर्तन को संक्रांति कहा जाता है। इस तरह साल में 12 संक्रांति तिथियां पड़ती हैं। जिनमें से मकर संक्रांति सबसे महत्वपूर्ण है। मकर संक्रांति को उत्तर भारत में खिचड़ी के नाम से भी जाना जाता है।
सूर्य को ऐसे दें अर्घ्य
ज्योतिषाचार्य मनीष मोहन के अनुसार, मकर संक्रांति पुण्यकाल में पवित्र नदियों में स्नान करके एक तांबे के लोटे में शुद्ध जल लेकर उसमें रोली, अक्षत, लाल पुष्प तथा तिल और गुड़ मिलाकर पूर्वाभिमुख खड़े होकर, दोनों हाथों को ऊपर उठाकर सूर्यदेव को श्रद्धापूर्वक गायत्री मंत्र या ‘ऊॅ घृणि सूर्याय नम: श्री सूर्य नारायणाय अर्घ्यं समर्पयामि।’ मंत्र के साथ अर्घ्य दें।
तिल का है विशेष महत्व
ज्योतिषाचार्य पंडित राकेश पांडेय के अनुसार, मकर संक्रांति में तिल का विशेष महत्व है। इस दिन पुण्यकाल में तिल के तेल की मालिश, तिल मिश्रित जल से स्नान, तिल का हवन, तिल से तर्पण, श्वेत तिल युक्त वस्तुओं का दान एवं सेवन करने से पूर्वजन्म के पाप नष्ट हो जाते हैं। धर्मसिंधु के अनुसार, श्वेत तिल से देवताओं का तथा काले तिल से पितरों का तर्पण करना चाहिए। मकर संक्रांति के दिन भगवान शिव के मंदिर में तिल के तेल का दीपक जलाना चाहिए।