बताया जाता है कि उसने तब पुलिस पर एक गोली भी चलाई थी, लेकिन इसी बीच सत्ता के करीबी जनप्रतिनिधि के हस्तक्षेप की वजह से मामला मैनेज हो गया और पुलिस के गन प्वाइंट से वह बच गया। इसके बाद ठेके के वर्चस्व को लेकर लोक निर्माण विभाग के दफ्तर में लालबहादुर और विनोद के बीच गैंगवार हुआ था। इसमें विनोद के दो साथी मारे गए थे। विनोद बच निकला।
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विनोद के एक करीबी दोस्त की मानें तो मई 2016 की बात है। विनोद अपने एक दोस्त के साथ सफारी गाड़ी से लखनऊ जा रहा था और उसकी मुखबिरी हो गई थी। बाराबंकी में उसकी गाड़ी को रोकने की कोशिश की गई तो उसने रफ्तार बढ़ा दी और भागने लगा। लखनऊ के हजरतगंज थाने में जाने के बाद ही माफिया विनोद ने अपनी गाड़ी रोकी थी। तब वह बच गया था। इसके बाद वह गोरखपुर में कम ही रहता था। उसने लखनऊ में ही ठिकाना बना लिया और बेटी की पढ़ाई भी वहीं से कराता था।
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विनोद को विधायक समझते थे आसपास के लोग
लखनऊ में जहां पर वह रहता था, वहां आसपास के लोग उसे विधायक समझते थे। उसके घर पर नेताओं का आना-जाना होता था। इस बात की जानकारी पुलिस को तब हुई थी, जब फरारी के समय उसकी तलाश में पुलिस लखनऊ स्थित आवास तक पहुंची थी।