स्वतंत्रता संग्राम सेनानी केशभान राय
जानीपुर (गोरखपुर)। देश जब स्वतंत्रता दिवस पर आजादी के अमृत इतिहास को याद करता है, तब उन अनगिनत स्वतंत्रता सेनानियों का स्मरण भी जरूरी हो जाता है, जिन्होंने देश के लिए संघर्ष किया। गोला क्षेत्र की धरती ने भी ऐसे ही एक जांबाज को जन्म दिया था। केशभान राय ने न केवल अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ संघर्ष किया बल्कि आजादी के बाद शिक्षा व राजनीति के क्षेत्र में भी अहम योगदान दिया।
महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन से प्रभावित केशभान राय ने अंग्रेजी शासन के विरुद्ध खुलकर आवाज उठाई। उन्होंने अपने शिष्यों और सहयोगियों के साथ स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भागीदारी की। अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ किए गए आंदोलनों में टेलीफोन के तार काटने जैसी गतिविधियां भी शामिल थीं। उनका उद्देश्य विदेशी शासन की व्यवस्था को चुनौती देना और देशवासियों में स्वतंत्रता की भावना को मजबूत करना था।
शिक्षा को बनाया राष्ट्र निर्माण का माध्यम : केशभान राय शिक्षा के महत्व को भी भली-भांति समझते थे। उनका मानना था कि शिक्षित और जागरूक समाज ही मजबूत राष्ट्र का निर्माण कर सकता है। इसी सोच के साथ उन्होंने जिले के ककरही में आनंद विद्यापीठ इंटर कॉलेज की स्थापना की। इस शिक्षण संस्थान में विद्यार्थियों को केवल किताबी शिक्षा तक सीमित नहीं रखा गया बल्कि शारीरिक श्रम और चरखा कातने जैसी गतिविधियों से भी जोड़ा गया। शिक्षा के साथ स्वावलंबन और राष्ट्रसेवा की भावना विकसित करना उनके दृष्टिकोण का महत्वपूर्ण हिस्सा था।
आजादी के बाद राजनीति में रही सक्रिय भूमिका
देश की आजादी के बाद भी केशभान राय ने सार्वजनिक जीवन से खुद को अलग नहीं किया। उन्होंने राजनीति में प्रवेश किया और बांसगांव विधानसभा क्षेत्र से चुनाव जीतकर जनप्रतिनिधि के रूप में अपनी भूमिका निभाई। बाद में उन्हें उत्तर प्रदेश सरकार में उप शिक्षामंत्री की जिम्मेदारी भी मिली। स्वतंत्रता आंदोलन से शासन-व्यवस्था तक उन्होंने राष्ट्र निर्माण को ही अपने जीवन का प्रमुख उद्देश्य बनाए रखा।
प्रतिमाएं आज भी दे रहीं इतिहास की गवाही
केशभान राय की स्मृतियां आज भी ककरही स्थित आनंद विद्यापीठ इंटर कॉलेज से जुड़ी हुई हैं। कॉलेज परिसर के बाहर उनकी व पं. रामलखन शुक्ल की प्रतिमाएं स्थापित हैं। दोनों ही स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े रहे और शिक्षा के क्षेत्र में भी उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा। विडंबना यह है कि देश की आजादी के लिए संघर्ष करने वाले इन सेनानियों की प्रतिमाएं आज संरक्षण की बाट जोह रही हैं। प्रतिमाओं को धूप और बारिश से बचाने के लिए छत की आवश्यकता है लेकिन इस ओर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया जा रहा है।
विरासत को सहेजने की जरूरत
स्वतंत्रता सेनानियों की प्रतिमाएं महज पत्थर या धातु की संरचनाएं नहीं होतीं, इतिहास की जीवंत स्मृतियां होती हैं। इनके माध्यम से नई पीढ़ी को यह जानने और समझने का अवसर मिलता है कि देश को आजादी यूं ही नहीं मिली बल्कि इसके पीछे हजारों लोगों का संघर्ष, त्याग और बलिदान था। जरूरत इस बात की है कि केशभान राय जैसे स्वतंत्रता सेनानियों की विरासत को केवल राष्ट्रीय पर्वों तक सीमित न रखा जाए बल्कि उनके संघर्ष और विचारों को नई पीढ़ी तक पहुंचाया जाए। यही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।