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Kargil Vijay Diwas: हम तिरंगे को फहरा कर आएं, या लिपटकर.... आएंगे जरूर

Sun, 26 Jul 2020 12:49 PM IST
गोरखपुर ब्यूरो अमर उजाला ब्यूरो, गोरखपुर।
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कारगिल विजय दिवस: शहीद शिव सिंह छेत्री के माता-पिता। - फोटो : अमर उजाला।
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‘हम तिरंगे को फहरा कर आएंगे या तिरंगे में लिपटकर, लेकिन वापस आएंगे जरूर’। महज 23 साल की उम्र में कारगिल युद्ध के दौरान अपने प्राण न्योछावर करने वाले राईफल मैन शिव सिंह छेत्री का देश सेवा का जज्बा कुछ ऐसा ही रहा होगा। बेटे को खोने का दुख तो परिवार को ताउम्र रहेगा, मगर बेटा ऐसा काम कर गया कि सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है।

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आज भी शहीद बेटे शिव सिंह छेत्री का जिक्र होते ही पिता गोपाल क्षेत्री और मां गीता देवी की आंखें नम हो जाती हैं। मां कहती हैं, बेटे के जाने का गम तो है लेकिन देश के लिए उसने जो कर दिखाया उस पर गर्व है। पूरा शहर हमें बेटे के नाम से जानता है, एक माता-पिता के लिए इससे अनमोल उपलब्धि कुछ नहीं हो सकती।

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कारगिल में शहीद होने वाले शिव सिंह छेत्री का बचपन बिछिया में बीता। 10वीं तक की पढ़ाई नेहरू इंटर कॉलेज से करने के बाद इंटरमीडिएट के लिए उन्होंने एमपी इंटर कॉलेज को चुना। अपने बैच के सबसे होनहार छात्र शिव सिंह छेत्री शिक्षकों और दोस्तों के प्रिय थे।

पिता गोपाल छेत्री नेे बताया कि बचपन से सेना में जाने की इच्छा रखने वाले शिव सिंह छेत्री ने जब 11वीं में एडमिशन लिया तो इस दौरान उनकी पोस्टिंग बनारस में हो गई। शिव भी पढ़ाई छोड़कर उनके पास बनारस चले गए।

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1999 में शहीद हुए थे दीपू

वहां पहुंचे और बोले, हमें भी सेना में भर्ती होना है। उस समय बनारस में गोरखा रेजीमेंट में भर्ती चल रही थी। एक अक्टूबर 1995 को शिव सिंह छेत्री ने टेस्ट दिया और उनकी भर्ती गोरखा रेजीमेंट में हो गई।

शिव सिंह छेत्री को घरवाले दीपू बुलाते थे। पिता गोपाल सिंह बताते हैं कि आखिरी बार आशीर्वाद लेकर ड्यूटी पर जाते बेटे का चेहरा उन्हें आज भी याद है। मां कहती हैं, बेटे के जाने का गम तो है लेकिन देश के लिए उसने जो कर दिखाया उस पर गर्व भी है।

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शिव सिंह छेत्री को 14 अगस्त 1999 को कुपवाड़ा सेक्टर में आतंकियों से मुठभेड़ के दौरान गोली लगी थी। 22 अगस्त को सेना के हास्पिटल में उनकी मौत हुई। शहादत के वक्त वह महज 23 साल के थे।

शहीद के अंतिम दर्शन को उमड़े थे शहरवासी
शहीद शिव सिंहछेत्री के अंतिम दर्शन को पूरा गोरखपुर उमड़ पड़ा था। बाद में उनके नाम पर बिछिया में मुख्य मार्ग बनाया गया। एक जुलाई 2001 को उनकी प्रतिमा का अनावरण किया गया। यह प्रतिमा आज भी शहर के नौजवानों को देश के लिए मर-मिटने की प्रेरणा देती है।
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