डॉ. अश्वनी मिश्रा।
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अगर इंजीनियर बनोगे तो कमाकर केवल अपने के लिए कुछ करोगे। अगर डॉक्टर बन गए तो देश की सेवा में अमूल्य योगदान रहेगा। पिता के यही शब्द डॉ अश्वनी मिश्रा के जीवन का टर्निंग प्वाइंट रहा। इन्हीं शब्दों को जीवन का सार बनाते हुए मेरठ से एमबीबीएस किया और फिर केजीएमयू लखनऊ से एमडी की डिग्री हासिल की।
गोल्ड मेडलिस्ट के साथ बेस्ट पास आउट के खिताब से नवाजे गए। उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग की परीक्षा में चयन हुआ और बीआरडी मेडिकल कॉलेज में आ गए। 32 वर्ष की उम्र में मेडिकल कॉलेज के चेस्ट रोग का विभागाध्यक्ष बन गए। तब से लगातार मरीजों की सेवा में जुटे हैं।
अब कोरोना वार्ड में सबसे चुनौतीपूर्ण जिम्मेदारी निभा रहे हैं। संक्रमित मरीजों के चेस्ट का एक्स-रे देखना व मरीजों को सलाह देना रोज की दिनचर्या में शामिल है। देवरिया के बरहज के छोटे से गांव टीकर के रहने वाले डॉ अश्वनी मिश्रा की शुरुआती शिक्षा गांव के प्राथमिक स्कूल में हुई। पिता स्व. हरिशंकर मिश्रा अरुणाचल प्रदेश में शिक्षक थे। प्रारंभिक शिक्षा के बाद वह अश्वनी को अपने साथ लेकर चले गए।