वैश्विक महामारी कोरोना के कारण बंद भारत-नेपाल की सीमा एक बार फिर दोनों देशों के रोटी-बेटी के रिश्तों में खटास घोलती नजर आ रही है। स्थिति यह है कि औपचारिक तौर पर मुख्य सीमा के रास्ते पैदल आवागमन पर पूर्ण रूप से प्रतिबंध जारी है, ऐसे में दोनों देशों की बहनों को पिछले वर्ष की तरह ही इस वर्ष भी भाई-बहन के प्रगाढ़ प्रेम के प्रतीक रक्षाबंधन पर्व में भाइयों की कलाई सूनी न रह जाए, इसकी उन्हें चिंता सताने लगी है। नौतनवां कस्बे की रहने वाली बहनों ने सरहद पार भाई को रक्षा सूत्र नहीं बांध पाने को लेकर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की।
बबिता थापा ने कहा कि उनका मायका नेपाल के अर्घाखांची में है। पिछले वर्ष भी कोरोना के कारण अपने भाइयों को राखी बांधने नहीं जा पाई थीं और इस बार भी हालात कुछ ऐसे ही इशारा कर रहे हैं।
पुष्पा थापा ने कहा कि भाई-बहन के पवित्र रिश्ते के प्रतीक रक्षाबंधन के दिन भी भाइयों की कलाई का सुना रह जाना हम बहनों के लिए बहुत ही दुखदाई घड़ी है। इस पवित्र त्यौहार में बहनों एवं भाइयों को आवागमन के लिए छूट देने की पहल की जाए।
किरन गुरुंग ने कहा कि प्रतिवर्ष रक्षाबंधन में बरमइल टोल बुटवल स्थित अपने मायके में भाइयों को राखी बांधने जाती रही हैं, लेकिन कोरोना ने सरहद पर ऐसी लकीर खींच दी है कि अब एक-दूसरे के बीच दूरियां बढ़ती ही जा रही है।
रानी थापा ने कहा कि भैरहवा के खजाना में उनका मायका है। कोरोना काल के दौरान ही उनके छोटे भाई की तबीयत काफी खराब हो गई थी, लेकिन वह सरहद की पाबंदियों के कारण अपने भाई को देखने तक नहीं जा सकीं।
गोरखा समाज के अध्यक्ष उत्तम थापा ने कहा कि दोनों देशों की सरकारों को बहनों का दर्द समझने की जरुरत है, ताकि रोटी-बेटी का यह संबंध हमेशा मजबूत और एक मिसाल बनकर बरकरार रहे।