होटल क्लार्क इन ग्रैंड के संचालक अमित बथवाल ने बताया कि बंदी का सबसे ज्यादा असर होटलों में चलने वाले रेस्टोरेंट पर हुआ है। अनुमति न मिलने की वजह से लोग लंच-डिनर के लिए नहीं आ रहे हैं। बैंक्वेट हॉल में भी कम लोगों की मौजूदगी में खर्च निकाल पाना बेहद मुश्किल है। जबकि बिजली का बिल, रख-रखाव पर खर्च पहले की तरह ही आ रहा है। अपनी जेब से पांच महीनों से पूरी व्यवस्था को चलाया जा रहा है। बचत के लिए बरसों से काम करने वाले कुक, स्टाफ में कटौती करनी पड़ी है। जल्द सुधार न हुआ तो कई रेस्टोरेंट और होटलों पर ताला लगाने की नौबत आ जाएगी।
30 का था स्टॉफ छह से चला रहे काम
क्लास बंक के डायरेक्टर राहुल सिंह ने बताया कि शासन से रेस्टोरेंट संचालकों को खाने के होम डिलीवरी की छूट दी गई है लेकिन इसके आर्डर भी बहुत कम आ रहे हैं। खाना पहुंचाने वाली कंपनियां 30-40 फीसदी होम डिलीवरी का चार्ज ले रहीं हैं। एक दिन में जहां 30-40 हजार का कारोबार होता था। वो सिमट कर चार से पांच हजार पर पहुंच गया है। इसमें स्टाफ की सैलरी, बिजली का खर्च, खाद्य सामग्री सब शामिल है। ऐसे में कोरोबार बर्बादी की कगार पर आ गया है। मजबूरी में 30 के स्टॉफ को घटाकर छह तक करना पड़ा है। सरकार को कारोबारियों के बारे में कोई रणनीति बनाने की जरूरत है।
रंगरेजा रेस्टोरेंट की डायरेक्टर सुप्रिया द्विवेदी ने बताया कि कोरोना काल में होटल इंडस्ट्री सर्वाधिक प्रभावित हुई है। लखनऊ, आगरा व प्रदेश के कुछ अन्य शहरों में इस व्यवसाय से जुड़े लोगों को छूट मिली है। लेकिन गोरखपुर के व्यवसायी वंचित हैं। केवल होम डिलीवरी से खर्चा तक नहीं निकल रहा है। अन्य शहरों की ही तरह गोरखपुर के कारोबारियों को कोविड गाइडलाइंस का पालन करते हुए होटल-रेस्टोरेंट चलाने की छूट मिलनी चाहिए।
होटल कारोबारियों के लिए सरकार उठाए कदम
होटल विवेक के डायरेक्टर अचिंत्य लाहिड़ी ने बताया कि रेस्टोरेंट खोलने की अनुमति मिलने के बाद नए सिरे से शुरूआत करनी होगी। सोशल डिस्टेंसिंग के लिहाज से टेबल की संख्या को घटाना पड़ेगा। सैनिटाइजेशन, मास्क, ग्लव्स और छह फीट दूरी का पालन कराया जाएगा। कोरोना की वजह से आने वाले लोगों की संख्या भी पहले की अपेक्षा कम होगी। इसके बाद भी रेस्टोरेंट के संचालन को हम तैयार बैठे हैं, क्योंकि इस तरह से कम से कम खर्च तो निकाला जा सकेगा। आखिर कब तक होटल कारोबारी अपनी जेब से व्यवसाय को चलाएगा। सरकार को इस दिशा में सोचना चाहिए कि देश को रोजगार देने के मामले में सातवें नंबर का ये सेक्टर बदहाली की मार क्यों झेल रहा है।