महायोगी गोरखनाथ विश्वविद्यालय में आयोजित अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी में सीएम योगी का विशेष व्याख्यान
गोरखपुर। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि मोक्ष या मुक्ति सिर्फ मरण से नहीं मिलती है, बल्कि श्रीमद्भागवत के अनुसार, धर्म के पथ पर चलते हुए सफलता के चरम पर पहुंचना ही मोक्ष है। महर्षि वेदव्यास ने भागवत पुराण के माध्यम से यह शिक्षा दी है कि सभी लोग धर्म के मार्ग का अनुसरण करें। धर्म के मार्ग का अनुसरण करने पर अर्थ और कामनाओं की भी सिद्ध हो सकती है।
सीएम योगी सोमवार को महायोगी गोरखनाथ विश्वविद्यालय में आयुर्वेद, योग और नाथपंथ पर आयोजित तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी में विशेष व्याख्यान दे रहे थे। सीएम ने कहा कि नियम-संयम का जीवन में बड़ा महत्व है। योग ने उसी को जोड़ा है। अंतःकरण की शुद्धि नियम-संयम से ही हो सकती है। नाथ योगियों ने क्रियात्मक योग के माध्यम से नियम-संयम की विशिष्ट विधा दी है।
उन्होंने कहा कि भारतीय मनीषा में हर व्यक्ति के जीवन का एक अभीष्ट होता है, धर्म के पथ पर चलते हुए मोक्ष की प्राप्ति करना। धर्म की साधना के लिए स्वस्थ शरीर की अपरिहर्ता हमारे ऋषियों, मुनियों ने बताई हैं। शरीर को स्वस्थ रखने के लिए आयुर्वेद, योग और नाथपंथ, तीनों नियम-संयम पर जोर देते हैं।
सीएम ने कहा कि आयुर्वेद, योग और नाथपंथ तीनों ही व्यवहारिकता के स्तर पर एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। तीनों ने ही शरीर को पंचभौतिक माना है।
नाथ योगियों ने दिया है अंतःकरण की शुद्धि पर जोर
सीएम योगी ने कहा कि योग के कई आसनों के नाम नाथ योगियों के नाम पर हैं। जैसे गोरखआसन, मत्स्येंद्रआसान, गोमुखआसन आदि। नाथ परंपरा में हर नाथ योगी जनेऊ धारण करता है, जो उसे शरीर की नाड़ियों से अवगत कराता है। नाथ जनेऊ की उपयोगिता उसे योगी की दीक्षा के समय बताई जाती है। योग हर नाथ योगी के जीवन का अभिन्न हिस्सा होता है।
गुरु गोरखनाथ ने सिखाई अवचेतन और अचेतन मन को साधने की क्रिया
मुख्यमंत्री ने कहा कि गुरु गोरखनाथ ने चेतन मन के साथ ही अवचेतन और अचेतन मन को साधने की क्रिया भी सिखाई है। मानव मन, बिना साधना के जितना चेतन होता है, वह संपूर्ण चेतना का बहुत छोटा भाग है। योग के माध्यम से साधना की चरम सीमा पर जाकर हम अवचेतन और अचेतन मन के रहस्यों को उद्घाटित कर सकते हैं।
सृष्टि के कालखंड की सबसे प्राचीन है भारतीय संस्कृति
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि भारत की सभ्यता और संस्कृति अति प्राचीन है। सृष्टि के कालखंड की सबसे प्राचीन संस्कृति भारतीय संस्कृति को माना जाता है। अलग-अलग कालखंड में ऋषियों, मुनियों ने अपनी ज्ञान के धारा के अनुभव से इसे नया आयाम प्रदान किया। पहले ज्ञान की परंपरा गुरु शिष्य के माध्यम से श्रवण परंपरा थी। उसे लिपिबद्ध करने का कार्य महर्षि वेदव्यास ने चार संहिताओं के माध्यम से किया। महर्षि वेदव्यास ने न केवल चार वेदों ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद की रचना की, बल्कि उन्होंने श्रीमद्भागवत पुराण समेत 18 पुराणों की रचना को भी ज्ञान से जोड़कर भारतीय संस्कृति को आगे बढ़ाया। महर्षि वेदव्यास द्वारा रचित श्रीमद्भागवत पुराण आज भी भारतवासियों को धर्म का सही मार्ग दिखाता है।
स्वागत संबोधन विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. सुरिंदर सिंह और आभार ज्ञापन आयुर्वेद कॉलेज के प्राचार्य डॉ. गिरिधर वेदांतम ने किया। इस अवसर पर मुख्यमंत्री के सलाहकार अवनीश अवस्थी, मुख्यमंत्री के सलाहकार एवं भारत सरकार के पूर्व औषधि महानियंत्रक डॉ. जीएन सिंह, आयुष विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. एके सिंह, बीएचयू के वरिष्ठ आचार्य डॉ. के. रामचंद्र रेड्डी, इस्राइल के आयुर्वेद औषधि विशेषज्ञ वैद्य गुई लेविन, श्रीलंका से आए आयुर्वेद विशेषज्ञ डॉ. टी. वीररत्ना, महायोगी गोरखनाथ विश्वविद्यालय के कुलसचिव डॉ. प्रदीप कुमार राव, शिक्षक और विद्यार्थी उपस्थित रहे।
संगोष्ठी की स्मारिका और दो पुस्तकों का सीएम ने किया विमोचन
मुख्यमंत्री योगी ने अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी की स्मारिका और डॉ. के रामचंद्र रेड्डी व डॉ. शांतिभूषण हांदुर की ओर से लिखित दो पुस्तकों का विमोचन किया। इससे पूर्व उन्होंने विश्वविद्यालय परिसर में आयुर्वेदिक दवाओं के निर्माताओं डाबर, वैद्यनाथ, श्रीधुतपापेश्वर, ऐमिल, हिमालया और वैद्यरत्नम की तरफ से लगाए गए स्टालों का भी अवलोकन किया।