कहा, मोबाइल और कंप्यूटर ने भले नई पीढ़ी में पुस्तकों के प्रति रुचि को कम कर दिया है, लेकिन धार्मिक पुस्तकों का महत्व पहले की तरह बरकरार है। वहीं, ट्रस्टी देवी दयाल अग्रवाल का कहना है कि गीता प्रेस की पुस्तकें नई पीढ़ी में संस्कार का निर्माण करने के साथ ही उनमें सनातन के प्रति रूचि बढ़ाती हैं। गीता प्रेस मांग की तुलना में 75 फीसदी पुस्तकें ही अपने पाठकों को उपलब्ध नहीं करा पा रहा है। यहां से सिर्फ श्रीमद्भागवत गीता की ही 24 हजार प्रतियां प्रतिदिन प्रकाशित होती है।
दूसरे देशों में भीं हो रहा है गीताप्रेस का विस्तार: गीताप्रेस की शाखा नेपाल के काठमांठो में है। यहां के सभी सात प्रदेशों में टीम गठित कर पुस्तक केंद्र खोलने की तैयारी चल रही है। जय किशन सारडा को अन्य देशों में विस्तार के लिए अंतरराष्ट्रीय संयोजक बनाया गया है।
15 भाषाओं में प्रकाशित होती हैं पुस्तकें
गीता प्रेस से वर्तमान में 15 भाषाओं में पुस्तकों का प्रकाशन हो रहा है। इनमें असमिया, बांग्ला, अंग्रेजी, गुजराती, हिंदी, कन्नड़, मलयालम, मराठी, नेपाली, उड़िया, पंजाबी, संस्कृत, तमिल, तेलगू व ऊर्दू शामिल हैं।
अब एक घंटे में छपते हैं 15 हजार पेज
गीता प्रेस के स्थापना के समय गीता प्रेस में एक दिन में मुश्किल से 100 पेज ही छप पाते थे। लेकिन, आधुनिक मशीनों के कारण यहां हर घंटे में 15 हजार अधिक रंगीन पेज की छपाई की जाती है।