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Gorakhpur AIIMS: कार्यकारी निदेशक के अचानक हटने से भौचक रह गए कर्मी, सुबह कार्यालय पहुंचने पर हुई जानकारी

Thu, 04 Jan 2024 10:36 AM IST
vivek shukla अमर उजाला ब्यूरो गोरखपुर।

सार

कोरोना संकट कॉल के दौरान एम्स की ओपीडी शुरू हुई थी। बड़ी मशक्कत के बाद एम्स ऋषिकेश की डीन एकेडमिक डॉ. सुरेखा किशोर को यहां का कार्यकारी निदेशक बनाया गया। उनका कार्यकाल मार्च 2025 तक था।
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गोरखपुर एम्स। - फोटो : अमर उजाला।
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कार्यकारी निदेशक के अचानक पद से हटाए जाने और नए निदेशक के तत्काल कार्यभार ग्रहण करने के चलते कई महत्वपूर्ण फाइलों पर हस्ताक्षर नहीं हो पाए। वजह यह कि पूर्व कार्यकारी निदेशक करीब 10 दिन से बीमार हैं। नए निदेशक ने कार्यभार ग्रहण करने के बाद जांच से संबंधित फाइलों की जानकारी मांग ली है। उन्होंने पूरे मामले को समझने के बाद ही किसी फाइल पर हस्ताक्षर की बात कही है।

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कोरोना संकट कॉल के दौरान एम्स की ओपीडी शुरू हुई थी। बड़ी मशक्कत के बाद एम्स ऋषिकेश की डीन एकेडमिक डॉ. सुरेखा किशोर को यहां का कार्यकारी निदेशक बनाया गया। उनका कार्यकाल मार्च 2025 तक था। एम्स अभी अपने शैशव काल में ही है और कॉर्डियो, नेफ्रालॉजी समेत कई विभाग डॉक्टर के अभाव में शुरू भी नहीं हो पाए हैं। नए चिकित्सा शिक्षकों और चिकित्सकों की भर्ती प्रक्रिया के दौरान कार्यकारी निदेशक के दोनों पुत्रों डॉ. शिखर किशोर वर्मा और डॉ. शिवल किशोर वर्मा की नियुक्ति पर सवाल उठ गया। इसकी शिकायत बीते साल मई में केंद्रीय सतर्कता आयोग से हुई।

इसमें आरोप लगाया गया था कि डॉ. सुरेखा किशोर ने कार्यालय और पद का स्पष्ट दुरुपयोग किया है। वह नियुक्ति प्राधिकारी थीं। उनके बेटों डॉ. शिखर किशोर वर्मा और डॉ. शिवल किशोर वर्मा को चयन समिति की सिफारिश के अनुमोदन के आधार पर नियुक्त किया जा रहा था। जांच शुरू हुई तो निर्माण व खरीद से जुड़े कई मामले भी सामने आ गए। इसके बाद सीवीसी ने जांच प्रभावित होने की आशंका जताते हुए कार्यकारी निदेशक पद पर तत्काल प्रभाव से किसी नए को जिम्मेदारी देने की सिफारिश की थी।
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जांच की फाइल खुली तो कई और भी नपेंगे
कार्यकारी निदेशक रहीं डॉ. सुरेखा किशोर के सख्त व्यवहार को लेकर कर्मचारी डरे रहते थे। लेकिन, जैसे ही उनके पद से हटाए जाने की जानकारी हुई अंदरखाने में इस बात की चर्चा भी शुरू हो गई कि जांच की आंच में कई और भी झुलसेंगे। खासकर वे लोग जो हर हां में हां मिला रहे थे।

कर्मचारियों का कहना था कि एम्स की ओपीडी में मरीजों को इलाज के लिए 10 रुपये का पर्चा लेना होता है, लेकिन बाइक जमा करने के लिए स्टैंड में 20 रुपये देने पड़ते हैं। इस तरह के तमाम मामले हैं। निर्माण और खरीद से संबंधित जो भी कार्य हुए हैं, उनके टेंडर से लेकर क्रियान्वयन तक तमाम ऐसे मामले हैं, जिनकी जांच होने की आशंका जताई जा रही है। हालांकि इन फाइलों में क्या-क्या दर्ज है, इसकी स्पष्ट जानकारी अभी नहीं हो पा रही है।

कार्यकारी निदेशक एम्स डॉ. जीके पॉल ने कहा कि पूर्व कार्यकारी निदेशक पर क्या-क्या आरोप हैं और उनमें क्या जांच हुई है, अभी इसकी जानकारी नहीं है। इनसे संबंधित सभी फाइलों को व्यक्तिगत तौर पर देखूंगा। कई बार ऐसे आरोप भी लगते हैं, जिनसे प्रशासनिक अफसर का सीधा संबंध तो नहीं होता, लेकिन जिम्मेदारी बताई जाती है। इसलिए जब तक सभी को पढ़कर समझ न लूं, इन मामलों में कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी। जल्दी ही सब कुछ सार्वजनिक हो जाएगा।
 
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