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चुनावी फ्लैश बैक: सियासत में विरासत संभालने से पीछे नहीं हटी आधी आबादी, उत्तराधिकारी बन सदन पहुंची पत्नियां

Sat, 22 Jan 2022 01:22 PM IST
vivek shukla राजन राय, गोरखपुर।

सार

सहजनवां से तीन बार विधायक रहे शारदा प्रसाद रावत की हत्या के बाद उनकी पत्नी प्रभा रावत ने मोर्चा संभाला। 1993 में सपा के टिकट पर चुनाव लड़कर विधायक बनीं।
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भाजपा, कांग्रेस और सपा के चुनाव चिन्ह - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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गोरखपुर जिले की सियासत में पति की राजनीतिक विरासत को संभालने में पत्नियां पीछे नहीं रहीं हैं। मुश्किल हालातों में भी न सिर्फ परिवार को संभाला है बल्कि पति की उत्तराधिकारी बनकर चुनाव लड़ीं। जीत दर्ज की और सदन में पहुंचीं।

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जिले के राजनीतिक इतिहास में ऐसा कई बार हुआ है। तत्कालीन विधायक रवींद्र सिंह, ओमप्रकाश पासवान, शारदा प्रसाद रावत और पूर्व मंत्री जमुना प्रसाद निषाद के निधन के बाद उनकी पत्नियों ने राजनीतिक विरासत को संभाला। चुनावी समर में कूद पड़ीं, क्षेत्र की जनता का भी समर्थन मिला और जीत दर्ज कर विधायक चुनी गईं। वर्ष 2012 में पूर्व मंत्री जमुना प्रसाद निषाद का मार्ग दुघर्टना में निधन हो गया।

पूर्व मंत्री की पत्नी राजमती निषाद राजनीतिक विरासत को संभालने के लिए आगे आईं। सपा के टिकट पर अच्छे मतों से जीतकर विधायक बनीं। इसी प्रकार सहजनवां से तीन बार विधायक रहे शारदा प्रसाद रावत की हत्या के बाद उनकी पत्नी प्रभा रावत ने मोर्चा संभाला। 1993 में सपा के टिकट पर चुनाव लड़कर विधायक बनीं। इसके बाद उनके बेटे यशपाल रावत ने राजनीतिक विरासत को संभाला और विधायक चुने गए।
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रवींद्र सिंह की हत्या के बाद पड़ी विरासत संभालने की पंरपरा

जिले की सियासत में पति की राजनीतिक विरासत संभालने की परंपरा विधायक रहे रवींद्र सिंह की पत्नी गौरी देवी के आने के बाद पड़ी। 1979 में रवींद्र सिंह की हत्या कर दी गई थी। गोरखपुर विश्वविद्यालय और लखनऊ विश्वविद्यालय छात्रसंघ के अध्यक्ष रह चुके रवींद्र सिंह तेज तर्रार नेता माने जाते थे। 1977 में रवींद्र सिंह कौड़ीराम विधानसभा क्षेत्र से जनता पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़े और करीब 11 हजार मतों से कांग्रेस के अरविंद को  पराजित किया।

रवींद्र सिंह की हत्या के बाद उनकी पत्नी गौरी देवी ने राजनीतिक मोर्चा संभाला और जनता पार्टी के बैनर तले चुनावी मैदान में कूद पड़ीं। कांग्रेस के लालचंद निषाद को हराकर निर्वाचित हुई। गौरी देवी 1989 में जनता दल और 1996 में सपा से चुनाव लड़कर सदन में पहुंचने में कामयाब रहीं।

ओमप्रकाश पासवान की हत्या के बाद पत्नी ने रखा राजनीति में कदम

मानीराम के तत्कालीन विधायक ओम प्रकाश पासवान की 25 मार्च 1996 को बांसगांव में चुनावी सभा के दौरान बम मारकर हत्या कर दी गई थी। ओम प्रकाश पिछड़ी बिरादरी के बड़े नेता माने जाते थे। उनकी हत्या के बाद पत्नी सुभावती पासवान ने राजनीति में कदम रखा। करीब 39 हजार मतों के अंतर से चुनाव जीतकर विधायक बनीं। इसी वर्ष सपा ने उन्हें बांसगांव लोकसभा क्षेत्र से प्रत्याशी बना दिया। सुभावती, भाजपा के राजनरायन पासवान को हराकर सांसद चुनी गईं। अब उनके बड़े बेटे कमलेश पासवान तीन बार से बांसगांव के सांसद और छोटे बेटे डॉ. विमलेश पासवान बांसगांव के विधायक हैं।
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